लालू-राबड़ी के बाद नीतीश राज भी ख़त्म, पर बिहार के सुस्त इंजीनियरों का 'शाही' मिजाज नहीं बदला; 24 साल बाद भी करोड़ों का हिसाब 'लापता'

बिहार सरकार ने 2002-03 से लंबित करोड़ों के जेल योजनाओं के बिलों का हिसाब माँगा है। लालू-राबड़ी और नीतीश राज के बाद भी इंजीनियरों ने हिसाब नहीं दिया। अब 15 अप्रैल तक का अल्टीमेटम, वरना अनुशासनात्मक कार्रवाई होगी।

लालू-राबड़ी के बाद नीतीश राज भी ख़त्म, पर बिहार के सुस्त इंज

Patna - : बिहार में सत्ता के गलियारे बदल गए, लालू-राबड़ी का कथित 'जंगलराज' गया और नीतीश कुमार का 'सुशासन' भी दो दशकों तक चला, लेकिन राज्य के भवन निर्माण विभाग के इंजीनियरों की कार्यशैली में कोई बदलाव नहीं आया। आलम यह है कि वित्तीय वर्ष 2002-03 से लेकर 2012-13 तक, यानी लगभग दो दशक से अधिक समय से विभिन्न जेलों (कारा) की योजनाओं के लिए दिए गए करोड़ों रुपये का विस्तृत हिसाब (डी०सी० विपत्र) आज भी विभाग को नहीं मिल सका है। इस घोर लापरवाही और उदासीनता पर अब नीतीश सरकार के भवन निर्माण विभाग ने कड़ा रुख अपनाते हुए दागी कार्यपालक अभियंताओं को 'आखिरी मोहलत' दी है।

अपर सचिव का कड़ा अल्टीमेटम: 15 अप्रैल तक हिसाब दो या वेतन भूलो

भवन निर्माण विभाग के अपर सचिव विनय कुमार द्वारा जारी पत्रांक 3354 के माध्यम से राज्य के दर्जनों भवन प्रमंडलों के कार्यपालक अभियंताओं को कड़ी चेतावनी दी गई है। पत्र में स्पष्ट कहा गया है कि मुख्य सचिव की अध्यक्षता में होने वाली मासिक बैठकों में बार-बार दिए गए निर्देशों के बावजूद अभियंताओं ने करोड़ों रुपये के समायोजन में कोई अभिरुचि नहीं दिखाई है। यह स्थिति अत्यंत खेदजनक और सरकारी धन के प्रति घोर लापरवाही का प्रतीक है। विभाग ने अब आर-पार की लड़ाई का मूड बनाते हुए आदेश दिया है कि यदि 15 अप्रैल 2026 तक सभी वांछित अभिलेखों, अभिश्रवों और जाँच पत्रों के साथ समायोजन की कार्रवाई पूरी नहीं की गई, तो संबंधित अधिकारियों का वेतन रोकते हुए उनके विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू कर दी जाएगी।

दो दशकों का 'काला इतिहास': किन जिलों में सबसे ज्यादा बकाया?

विभागीय समीक्षा में यह तथ्य सामने आया है कि 2002 से लेकर 2013 तक की लंबी अवधि में जेल निर्माण और मरम्मत कार्य के लिए भारी-भरकम राशि जारी की गई थी। लेकिन इंजीनियरों ने काम तो कराया, पर उसका विस्तृत लेखा-जोखा (डी०सी० बिल) जमा करने की जहमत नहीं उठाई। जारी सूची के अनुसार, बक्सर, सासाराम, आरा, गोपालगंज, सीवान, मधुबनी, सीतामढ़ी, समस्तीपुर, कटिहार, अररिया, सुपौल, बेगूसराय, गया, औरंगाबाद, नवादा और जहानाबाद के प्रमंडलों में करोड़ों का हिसाब पेंडिंग है। अकेले मुख्य शीर्ष 2056 के तहत $48,34,028$ रुपये का समायोजन लंबित है। इसके अलावा बेउर (पटना), बिहारशरीफ, हाजीपुर और दानापुर जैसे महत्वपूर्ण केंद्रों पर भी लाखों रुपये का हिसाब बाकी है।

बची हुई राशि वापस करने का भी सख्त निर्देश

विभाग ने न केवल बिलों के समायोजन का आदेश दिया है, बल्कि अभियंताओं को यह भी साफ कर दिया है कि यदि योजनाओं के क्रियान्वयन के बाद कोई राशि अवशेष बची है, तो उसे तुरंत सरकारी खजाने में वापस किया जाए। इसके लिए विभाग ने कारा निरीक्षणालय का विशिष्ट Payee ID (133969600) जारी किया है, जिसमें प्रमंडल के 'डिपॉजिट हेड' में जमा अव्यवहृत राशि को अंतरित करना अनिवार्य है। इस पूरी प्रक्रिया में सहायता के लिए वित्त विभाग के नोडल पदाधिकारी डॉ० अरूण कुमार को भी नामित किया गया है, ताकि इंजीनियरों के पास अब कोई बहाना न बचे।

प्रशासनिक लापरवाही पर 'जीरो टॉलरेंस' का आख़िरी प्रहार?

लालू-राबड़ी राज के बाद नीतीश कुमार ने 'सुशासन' का दावा किया था, लेकिन 24 साल पुराने वित्तीय मामलों का लटका रहना इस दावे पर गंभीर सवाल खड़े करता है। भवन निर्माण विभाग की इस नवीनतम कार्रवाई को राज्य सरकार की भ्रष्टाचार और लापरवाही के प्रति 'जीरो टॉलरेंस' की नीति से जोड़कर देखा जा रहा है। पत्रांक 3354 के माध्यम से यह संदेश साफ कर दिया गया है कि पुराने वित्तीय मामलों को अब और अधिक लटकाया नहीं जा सकता। सर्वोच्च प्राथमिकता के आधार पर कार्रवाई पूरी करने के लिए विभाग ने केवल एक सप्ताह का समय दिया है। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या सुस्त इंजीनियर इस 'आखिरी मोहलत' का सम्मान करते हैं या सरकार को कड़ा फैसला लेने पर मजबूर होना पड़ता है।