जदयू से निष्कासन के बाद अनंत सिंह की विधायकी पर क्या होगा? संविधान की दसवीं अनुसूची और सुप्रीम कोर्ट का फैसला जान लें
जदयू ने मोकामा विधायक अनंत सिंह को पार्टी से 6 साल के लिए निष्काशित किए जाने के साथ-साथ उनकी विधान सभा सदस्यता खत्म किए जाने की अनुशंसा किया है। जिसके बाद यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या उनकी विधायकी खत्म हो जाएगी.......
Anant Singh:मोकामा के बाहुबली विधायक अनंत कुमार सिंह को जनता दल यूनाइटेड (जदयू) ने शनिवार को छह साल के लिए पार्टी से निष्कासित कर दिया है। पार्टी ने उनकी प्राथमिक सदस्यता तत्काल प्रभाव से रद्द करने के साथ ही बिहार विधानसभा अध्यक्ष से संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत उनकी विधानसभा सदस्यता समाप्त करने की अनुशंसा भी की है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल है कि क्या जदयू से निष्कासन के साथ ही अनंत सिंह की विधायकी भी खत्म हो जाएगी?
दरअसल बिहार में हुए MLC चुनाव में अनंत सिंह ने जदयू प्रत्याशी नीरज कुमार का विरोध किया था। उन्होंने जनसुराज से पटना स्नातक सीट पर उम्मीदवार अनुज कुमार सिंह को समर्थन किया था। 23 October को हुए मतदान के बीच ही नीरज कुमार ने कहा था कि अनंत सिंह का पार्टी उपचार करेगी। इसके 24 घंटे बाद ही अनंत के खिलाफ पार्टी का एक्शन हुआ है।
अनंत की जायेगी विधान सभा सदस्यता
इसका सीधा जवाब है- नहीं। पार्टी से निष्कासन और विधानसभा की सदस्यता समाप्त होना दो अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। जदयू की ओर से सदस्यता रद्द करने की अनुशंसा किए जाने भर से अनंत सिंह का विधायक पद अपने आप समाप्त नहीं हो जाता।
क्या कहता है संविधान?
भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची में दल-बदल के आधार पर सांसदों और विधायकों को अयोग्य ठहराने के प्रावधान हैं। इसके तहत विधानसभा अध्यक्ष को यह तय करना होता है कि संबंधित विधायक दल-बदल विरोधी कानून के तहत अयोग्य ठहराए जाने योग्य हैं या नहीं।
अनंत सिंह के मामले में जदयू ने पार्टी के निर्देशों की अवहेलना करने, शीर्ष नेतृत्व के खिलाफ अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल करने और हाल ही में संपन्न विधान परिषद चुनाव में पार्टी उम्मीदवार के खिलाफ काम करने तथा दूसरे दल के उम्मीदवार के पक्ष में प्रचार करने का आरोप लगाया है।
पार्टी ने इन्हीं आरोपों के आधार पर उनकी विधानसभा सदस्यता समाप्त करने की अनुशंसा की है। हालांकि, इस अनुशंसा पर अंतिम निर्णय संबंधित संवैधानिक प्रक्रिया के तहत ही होगा।
पार्टी से निकाले जाने पर भी बच सकती है विधायकी
कानूनी रूप से पार्टी से निष्कासित किया जाना अपने आप में विधायक की सदस्यता समाप्त करने के बराबर नहीं है। सुप्रीम कोर्ट भी स्पष्ट कर चुका है कि किसी विधायक को उसकी पार्टी से निष्कासित कर देने मात्र से दल-बदल विरोधी कानून के तहत उसकी राजनीतिक संबद्धता का कानूनी आधार समाप्त नहीं हो जाता।
साल 1996 में G. Viswanathan बनाम तमिलनाडु विधानसभा अध्यक्ष मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि किसी विधायक को पार्टी से निष्कासित कर देने मात्र से दसवीं अनुसूची के तहत उसकी राजनीतिक दल की सदस्यता का कानूनी आधार समाप्त नहीं हो जाता। यानी पार्टी से निकाला जाना और विधानसभा की सदस्यता समाप्त होना दो अलग बातें हैं।
इसलिए अनंत सिंह के मामले में भी यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि उनके खिलाफ लगाए गए आरोप संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्यता का आधार बनते हैं या नहीं।
क्या दूसरे उम्मीदवार का प्रचार करना पड़ेगा भारी?
इस पूरे मामले में सबसे अहम सवाल विधान परिषद चुनाव में पार्टी उम्मीदवार के खिलाफ काम करने और दूसरे दल के उम्मीदवार के पक्ष में प्रचार करने का है। जदयू ने इसे पार्टी के निर्देशों की अवहेलना माना है और इसी आधार पर कार्रवाई की है।
हालांकि, पार्टी अनुशासन का उल्लंघन और दल-बदल विरोधी कानून के तहत अयोग्यता अलग-अलग कानूनी प्रश्न हैं। केवल पार्टी विरोधी गतिविधि का आरोप लगने से विधायक की सदस्यता स्वतः समाप्त नहीं हो जाती। मामले में लागू संवैधानिक प्रावधानों और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर निर्णय लिया जाना होगा।
अब विधानसभा अध्यक्ष के फैसले पर नजर
फिलहाल जदयू ने अनंत सिंह को पार्टी से बाहर करने के साथ उनकी विधायकी समाप्त करने की अनुशंसा की है। लेकिन उनकी विधानसभा सदस्यता का भविष्य केवल पार्टी के इस फैसले से तय नहीं होगा।
अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष इस मामले में क्या प्रक्रिया अपनाई जाती है और इस पर क्या निर्णय होता है। यदि अनंत सिंह को संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्य घोषित किया जाता है, तो उनकी विधायकी समाप्त हो सकती है। ऐसे निर्णय को कानूनी रूप से चुनौती देने का रास्ता भी उपलब्ध हो सकता है।
यानी फिलहाल अनंत सिंह को जदयू से निष्कासित कर दिया गया है, लेकिन उनकी मोकामा की विधायकी पर अंतिम फैसला होना अभी बाकी है। यह विधान सभा अध्यक्ष के फैसले पर निर्भर है।
प्रिय दर्शन की रिपोर्ट