Bihar News : प्रो. राजाराम प्रसाद की मैथिली लोकसाहित्य पर दो पुस्तकों का हुआ विमोचन, विद्वानों ने साहित्य को बताया समाज का दर्पण
Bihar News : पटना में मैथिली लोकसाहित्य पर प्रो. राजाराम प्रसाद लिखित दो पुस्तकों का विमोचन किया गया. इस मौके पर विद्वानों ने साहित्य को समाज का दर्पण बताया......पढ़िए आगे
PATNA : साहित्य समाज का जीवित प्रतिबिम्ब, सांस्कृतिक निरन्तरता तथा अक्षय धरोहर का दर्पण होता है। पुस्तक विमोचन समारोह एक मात्र समारोह नहीं अपितु सांस्कृतिक विरासत और परम्पर को स्मरण रखने का दिन है। पुस्तक का प्रणयन कोइ साधारण सी बात नहीं है, यह वर्षों की साधना का प्रतिफल होता है। इस बात को वही समझ सकते हैं जो स्वयं लेखक हैं -- "विद्वानेव हि जानाति विद्वज्जन परीश्रमम्। न हि वन्ध्या विजानाति गर्भिणी प्रसवव्यथाम्।।"
उक्त बातेँ बिहार राज्य उच्चतर शिक्षा परिषद,पटना के सभागार में डॉ. राजाराम प्रसाद के पुस्तक "मैथिली लोकसाहित्यक विस्तृत इतिहास", भाग--2 तथा "मैथिली लोकसाहित्यक विस्तृत इतिहास", भाग--3 के विमोचन करते हुए बिहार सरकार के उच्च शिक्षा निदेशक प्रोफेसर (डॉ.) एन.के. अग्रवाल ने कही। उन्होंने कहा कि मैथिली अपनी विशिष्ट शैली के लिए प्रसिद्ध तथा लोकप्रिय है । लोकसाहित्य के महत्व को अंकित करते हुए उन्होंने कहा कि यह वर्तमान समय में अत्यंत व्यापक तथा प्रासंगिक है। भारत सरकार तथा बिहार सरकार लोकसाहित्य को बढ़ावा देने के लिए आवश्यक कदम उठा रहा है । उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर विस्तार से चर्चा करते हुए उसमे लोकसाहित्य के महत्व को रेखांकित किया।
पूर्व कुलपति प्रो. रास बिहारी प्रसाद सिंह ने कहा कि पुस्तक की संख्या महत्वपूर्ण नहीं है अपितु गुणात्मक होना चाहिए। भारत सरकार की सराहना करते हुए उन्होंने कहा कि 22 भाषाओं में अनुवाद का कार्य हो रहा है जिसमें मैथिली भी है। पूर्व कुलपति आर.के.पी.रमण ने इस लोक साहित्य के इतिहास को 'अष्टादश पुराण' की तरह अठारह भाग में लिखने की सलाह दी। पूर्व कुलपति डॉ. फारुक अली ने कहा कि क्षेत्रीय भाषा में मिठास अधिक होती है, अत: लोगों को अधिक से अधिक क्षेत्रीय भाषा में रचना करना चाहिए। पूर्व कुलपति ति.मा. भागलपुर प्रो. जवाहरलाल ने साहित्य तथा लोकसाहित्य का विश्लेषण करते हुए उसे एक दूसरे से भिन्न सावित किए। उन्होंने कहा कि पुराने जमाने में साहित्य लिखित होता था तथा लोकसाहित्य मौखिक किन्तु आज दोनों ही लिखित है। ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय , दरभंगा के पूर्व विभागाध्यक्ष तथा पूर्व संकायाध्यक्ष प्रोफेसर रमण झा ने कहा कि सद्य: लोकार्पित पुस्तक लोकसाहित्य का एक अनुपम दस्तावेज है। एक जगह लोगों को सारी सामग्री मिल जायगी। उन्होंने कहा कि यह पुस्तक शिक्षक, विद्यार्थी, शोधार्थी सबों के लिए अत्यंत उपयोगी है।
स्वागत भाषण करते हुए पुस्तक के प्रणेता, पूर्व प्रतिकुलपति, पटना विश्वविद्यालय,पटना, प्रो. राजाराम प्रसाद ने आगत अतिथियों का स्वागत किया तथा पुस्तक के संबंध में विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने कहा कि अंक 4 भी प्रकाशन के लिए तैयार है। पूर्व प्रधानाचार्य डा. लालपरी देवी ने आगत अतिथियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए उन्हें धन्यवाद दिया। कार्यक्रम का शुभारंभ पुतुल और प्रियंका के द्वारा " जय जय भैरवि" गायन से हुआ। इस अवसर पर डा.भाग्यनारायण झा, डॉ. विष्णु प्रसाद (अवर सचिव, मद्यनिषेध), डॉ.वीणा कुमारी ,डा. बलवन्त कुमार, अभिलाषा 'सोनी' माला झा, सुमित आनन्द, डॉ.प्रियंका, डॉ. कुमारी प्रीति ,ई. सुप्रिया बुलबुल,ई.अभितेष कुमार इत्यादि की गरिमामयी उपस्थिति थी। कार्यक्रम का संचालन पुतुल प्रियंवदा के द्वारा किया गया।