जब संकट में थे नीतीश, तब साथ खड़े हुए थे चौधरी, अब 13 साल बाद सुशासन बाबू ने भाजपा के विरोध के बाद भी बनाया बिहार का 'सम्राट'

राजनीति में कोई भी ना स्थायी दोस्त, ना दुश्मन होता है. सम्राट चौधरी इसका सबसे बड़ा उदाहरण बने हैं जिनका नीतीश कुमार के साथ एक अनोखा रिश्ता रहा.

 relationship between Nitish Kumar and Samrat Chaudhary
relationship between Nitish Kumar and Samrat Chaudhary- फोटो : news4nation

Samrat Choudhary :  साल 2013, बिहार की राजनीति के लिए उथल-पुथल भरा दौर। नीतीश कुमार ने नरेंद्र मोदी के कारण भारतीय जनता पार्टी से नाता तोड़ लिया था और उनकी सरकार बिहार में बहुमत के संकट में घिर गई थी। आंकड़ों का गणित उनके खिलाफ खड़ा था और सत्ता कभी भी हाथ से फिसल सकती थी। ऐसे मुश्किल वक्त में एक नाम अचानक उनके लिए संजीवनी बनकर उभरा सम्राट चौधरी। सम्राट चौधरी उस समय राष्ट्रीय जनता दल (RJD) में थे, लेकिन उन्होंने 13 विधायकों के साथ पाला बदलते हुए नीतीश सरकार को गिरने से बचा लिया। यह वही क्षण था जब राजनीतिक विरोध के बीच एक ऐसा रिश्ता बना, जिसकी गूंज आज तक सुनाई देती है। एक तरह से नीतीश ने वह कर्ज उतार दिया जो सम्राट ने उनकी सरकार को बचाने के लिए 2013 में किया था।


यही कारण है कि सम्राट को जब भाजपा विधायक दल का नेता चुना गया उसके बाद उप मुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा ने जो प्रतिक्रिया दी वह दिखाता है कि भाजपा में सम्राट को लेकर सब कुछ सही नहीं था। उन्होंने कहा, “अभी BJP में तीसरी और चौथी पीढ़ी सक्रिय है. हमने बरसों बरस खून-पसीना बहाया औऱ बलिदान दिया, तब यह अवसर आया है. अपने कमांडर के आदेश के अनुसार, गठबंधन की राजनीति को साथ लेकर चलने के लिए हमने सम्राट चौधरी जी के नाम का प्रस्ताव किया है।” कहा यहां तक जाता है कि बिहार भाजपा के कई नेताओं ने दिल्ली में शीर्ष नेतृत्व के सामने सम्राट के नाम का विरोध किया था लेकिन मोदी-शाह ने स्पष्ट कर दिया कि नीतीश कुमार ही चाहते हैं कि सम्राट मुख्यमंत्री बने। ऐसे में उनकी मर्जी के आगे हमारा विरोध मायने नहीं रखता। यानी नीतीश ने वह कर्ज उतार दिया जो सम्राट ने 2013 में दिया था।


नीतीश–शकुनी: साथ, दूरी और सियासी खटास

इस कहानी की जड़ें और पीछे जाती हैं। सम्राट के पिता शकुनी चौधरी और नीतीश कुमार कभी एक ही राजनीतिक धारा के साथी थे। कुर्मी और कुशवाहा समीकरण को बिहार में ‘लव-कुश’ की जोड़ी कहा जाता है, और दोनों नेताओं की जोड़ी भी इसी सामाजिक समीकरण का प्रतीक मानी जाती थी। लालू यादव को सत्ता से हटाने के लिए नीतीश और शकुनी ने एकजुट होकर लव-कुश समीकरण को गांव गांव में मजबूत किया। लेकिन समय के साथ रिश्तों में खटास आ गई। शकुनी चौधरी ने नीतीश का साथ छोड़ दिया और लालू प्रसाद यादव के साथ RJD में चले गए। यही वह दौर था जब सम्राट चौधरी भी RJD की राजनीति में सक्रिय हुए और अपनी अलग पहचान बनाई।


सम्राट का सियासी सफर

सम्राट चौधरी का राजनीतिक जीवन विरासत से शुरू होकर संघर्षों से गुजरता है। महज 19 साल की उम्र में लालू प्रसाद यादव ने उन्हें मंत्री बना दिया, लेकिन कम उम्र के कारण उन्हें पद छोड़ना पड़ा। इसके बाद उन्होंने 2000 और 2010 में परबत्ता से विधायक बनकर खुद को स्थापित किया। 2013 का घटनाक्रम उनके करियर का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ, जब उन्होंने नीतीश कुमार का साथ देकर उनकी सरकार बचाई। हालांकि इसके बाद उनके रास्ते फिर अलग हो गए। सम्राट ने JDU, ‘हम’ और अंततः 2018 में BJP का दामन थामा। पार्टी में उनका कद तेजी से बढ़ा प्रदेश उपाध्यक्ष, विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष, फिर 2023 में प्रदेश अध्यक्ष और 2024 में उपमुख्यमंत्री तक का सफर उन्होंने कम समय में तय किया।


विरोध से विश्वास तक

राजनीति में उनके तेवर हमेशा आक्रामक रहे। एक समय ऐसा भी आया जब उन्होंने मुरेठा बांधकर ऐलान किया कि जब तक नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद से नहीं हटाएंगे, तब तक इसे नहीं खोलेंगे। लेकिन राजनीति में समीकरण बदलते देर नहीं लगती। जब नीतीश कुमार फिर NDA के साथ आए, तो सम्राट ने अपना मुरेठा खोल दिया और अपने संकल्प को पूरा बताया।


अब मुख्यमंत्री की कुर्सी तक

आज हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। कभी विरोधी रहे नीतीश कुमार ने ही सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री पद तक पहुंचाया है। राजनीतिक जानकार इसे 2013 के उस समर्थन का प्रतिफल मानते हैं, जब सम्राट ने संकट में फंसी नीतीश सरकार को बचाया था।