Prashant Kishor: बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंचे प्रशांत किशोर, क्या फिर होगा चुनाव?
Prashant Kishor: प्रशांत किशोर ने बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। जन सुराज पार्टी ने चुनाव के बाद महिलाओं को पैसे ट्रांसफर करने को आचार संहिता का उल्लंघन बताया है।
Prashant Kishor: जन सुराज पार्टी के प्रमुख और चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने पिछले साल बिहार में हुए विधानसभा चुनावों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। उन्होंने अदालत से राज्य में फिर से चुनाव कराने की मांग की है। प्रशांत किशोर का कहना है कि चुनाव के दौरान सरकार ने नियमों का उल्लंघन किया, जिससे चुनाव की निष्पक्षता पर सवाल खड़े होते हैं।
याचिका में आरोप लगाया गया है कि चुनाव की घोषणा के बाद बिहार सरकार ने आचार संहिता का उल्लंघन किया। पार्टी का दावा है कि सरकार ने “मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना” के तहत महिलाओं के बैंक खातों में 10 हजार रुपये ट्रांसफर किए। जन सुराज पार्टी का कहना है कि चुनाव के समय इस तरह से पैसा देना सीधे तौर पर मतदाताओं को प्रभावित करने जैसा है। इस मामले की सुनवाई शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में हो सकती है। यह सुनवाई प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की पीठ के सामने होने की संभावना है। याचिका में चुनाव आयोग से भी कार्रवाई की मांग की गई है।
पैसे ट्रांसफर करना चुनावी लाभ लेने का तरीका
याचिका के अनुसार, चुनाव आयोग को संविधान के अनुच्छेद 324 और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 123 के तहत इस मामले में हस्तक्षेप करना चाहिए। पार्टी का कहना है कि सीधे पैसे ट्रांसफर करना चुनावी लाभ लेने का तरीका है, जो कानून के खिलाफ है। गौर करने वाली बात यह है कि बिहार विधानसभा चुनाव में बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए ने बड़ी जीत हासिल की थी। एनडीए ने 243 में से 202 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी। दूसरी ओर, आईएनडीआईए गठबंधन को सिर्फ 35 सीटें मिली थीं। कांग्रेस को इनमें से छह सीटें ही मिलीं।
चुनाव बेहद निराशाजनक रहा - प्रशांत किशोर
जन सुराज पार्टी के लिए यह चुनाव बेहद निराशाजनक रहा था। पार्टी का एक भी उम्मीदवार चुनाव नहीं जीत पाया और ज्यादातर उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई थी। इसके बावजूद पार्टी का कहना है कि वह लोकतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए यह कानूनी लड़ाई लड़ रही है। अब सबकी नजर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर टिकी है। यह देखना अहम होगा कि अदालत इस मामले में क्या रुख अपनाती है और चुनाव आयोग को क्या निर्देश देती है।