Bihar Politics:तीन दशक से BJP का गढ़ बना बांकीपुर अब बनेगा पीके टेस्ट? जन सुराज के फैसले से बदल सकता है खेल, पढ़िए इस सीट पर क्यों है सबकी निगाह
Bihar Politics:बिहार की राजनीति में बांकीपुर उपचुनाव को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं, और इसकी सबसे बड़ी वजह जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर माने जा रहे हैं।...
Bihar Politics: बिहार की सियासत इन दिनों एक नए सियासी उबाल पर है, और केंद्र में हैं जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर। चर्चा तेज़ है कि पटना की हाई-प्रोफाइल बांकीपुर विधानसभा सीट पर होने वाले उपचुनाव में क्या पीके खुद मैदान में उतरेंगे या नहीं। यह वही सीट है जिस पर पिछले तीन दशकों से भारतीय जनता पार्टी का मजबूत कब्जा रहा है, और जिसे अब नितिन नवीन के राज्यसभा जाने के बाद खाली माना जा रहा है।
सियासी हलकों में यह सवाल गरम है कि क्या प्रशांत किशोर का बांकीपुर से चुनाव लड़ना उनकी पार्टी जन सुराज के लिए “राजनीतिक ऑक्सीजन” साबित होगा या एक बड़ा रिस्क बन जाएगा। विश्लेषकों का मानना है कि अगर पीके मैदान में उतरते हैं तो यह मुकाबला सिर्फ एक उपचुनाव नहीं रहेगा, बल्कि बिहार की राजनीति का नैरेटिव बदलने वाला टकराव बन जाएगा।
जन सुराज, जिसकी शुरुआत 2022 में एक जन अभियान के रूप में हुई थी और जिसे 2024 में राजनीतिक पार्टी का रूप दिया गया, 2025 के विधानसभा चुनाव में लगभग 3.5 प्रतिशत वोट हासिल कर चुकी है, लेकिन सीटों के लिहाज से खाली हाथ रही। ऐसे में बांकीपुर जैसी हाई-प्रोफाइल सीट पार्टी के लिए राजनीतिक पुनर्जन्म का मंच बन सकती है।
अगर प्रशांत किशोर यहां से जीतते हैं, तो यह जन सुराज के लिए एक बड़ी वैधता होगी एक मजबूत सियासी ठिकाना और विपक्षी राजनीति में सीधी एंट्री। वे एक मुखर और रणनीतिक नेता के रूप में स्थापित होकर 2030 की राजनीति में त्रिकोणीय मुकाबले की नींव रख सकते हैं।लेकिन दूसरी तरफ अगर हार मिलती है, तो विरोधी दल इसे राजनीतिक असफलता के तौर पर पेश करेंगे। हालांकि इतिहास बताता है कि हार किसी बड़े नेता का अंत नहीं होती नीतीश कुमार से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी तक कई दिग्गज चुनावी हार के बाद भी सियासत में और मजबूत होकर लौटे हैं।
एक और चर्चा यह भी है कि विपक्षी गठबंधन पीके के पक्ष में मैदान खाली कर सकता है, लेकिन राजनीतिक जानकार इसे बेहद कम संभावना वाला समीकरण मानते हैं, क्योंकि महागठबंधन नहीं चाहेगा कि कोई तीसरी ताकत सीधा उभार ले। कुल मिलाकर, बांकीपुर उपचुनाव सिर्फ एक सीट का नहीं बल्कि बिहार की सियासी दिशा का इम्तिहान बनता जा रहा है। प्रशांत किशोर लड़ें या न लड़ें, यह तय है कि यह फैसला आने वाले समय में जन सुराज की राजनीति को नई धार जरूर देगा चाहे जीत की शक्ल में या सियासी बहस की शक्ल में।
रिपोर्ट- अभिजीत सिंह