Bihar Politics: बिहार में विधान परिषद की 8 सीटें होंगी खाली,शिक्षक-स्नातक चुनाव के लिए नीरज कुमार से लेकर मदन मोहन झा तक की अग्निपरीक्षा, दांव पर सम्राट की साख और महागठबंधन की उम्मीदें
Bihar Politics: नवंबर में विधान परिषद की आठ सीटों पर चुनाव होने वाल है, इसको लेकर अभी से राजनीतिक गलियारों में सरगर्मी तेज हो गई है।
Bihar Politics: बिहार की सियासत में भले ही विधानसभा चुनाव की आहट सबसे ज्यादा सुनी जाती हो, लेकिन इस बार विधान परिषद की आठ सीटों पर होने वाला चुनाव भी कम दिलचस्प नहीं होने जा रहा। शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों से चुनी जाने वाली इन आठ सीटों पर मुकाबला सिर्फ उम्मीदवारों के बीच नहीं, बल्कि सत्ता और विपक्ष की साख, संगठन की ताकत और राजनीतिक पकड़ की भी परीक्षा बनने वाला है। यही वजह है कि चुनावी बिगुल बजने से पहले ही राजनीतिक गलियारों में सरगर्मी तेज हो गई है।
हाल ही में विधान परिषद की 10 सीटों पर चुनाव संपन्न हुए थे, लेकिन वहां मुकाबले की नौबत ही नहीं आई। जितने उम्मीदवार, उतनी ही सीटें और सभी निर्विरोध जीतकर सदन पहुंच गए। मगर अब जो आठ सीटें खाली हो रही हैं, वहां लड़ाई का मिजाज बिल्कुल अलग है। यहां मतदाता सीमित हैं, लेकिन बेहद जागरूक हैं। शिक्षक और स्नातक वोटर किसी लहर या नारों से नहीं, बल्कि अपने अनुभव, संपर्क और मुद्दों के आधार पर फैसला करते हैं। यही कारण है कि इन चुनावों को हमेशा राजनीतिक दलों के लिए प्रतिष्ठा की जंग माना जाता है।
सबसे अधिक चर्चा पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र की है, जहां जदयू के मुख्य प्रवक्ता नीरज कुमार फिर मैदान में उतरने की तैयारी में हैं। पिछली बार उन्होंने राजद समर्थित उम्मीदवार को पराजित किया था। इस बार समीकरण कुछ बदले हुए हैं। उनके पुराने प्रतिद्वंद्वी आजाद गांधी अब भाजपा के साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं। इससे एक तरफ नीरज कुमार को फायदा मिलने की चर्चा है, तो दूसरी तरफ बागी उम्मीदवारों और स्थानीय समीकरणों को लेकर उनकी मुश्किलें भी बढ़ती नजर आ रही हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस चुनाव का परिणाम भाजपा प्रदेश अध्यक्ष सम्राट चौधरी की राजनीतिक साख से भी जोड़कर देखा जाएगा।
तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में मुकाबला और भी रोचक दिख रहा है। यहां सबसे अधिक 1.35 लाख मतदाता हैं। पिछली बार हुए उपचुनाव में जदयू को करारी शिकस्त मिली थी, जब शिक्षक नेता बंशीधर बृजवासी ने निर्दलीय चुनाव लड़कर सत्ता पक्ष के उम्मीदवार को हरा दिया था। अब जदयू के अभिषेक झा फिर से मैदान सजाने में जुटे हैं और जीत का दावा कर रहे हैं। लेकिन तिरहुत की राजनीतिक जमीन पर जीत का रास्ता इतना आसान नहीं माना जा रहा।
उधर शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में भी सियासी तापमान तेजी से बढ़ रहा है। पटना शिक्षक क्षेत्र से नवल किशोर यादव लगातार शिक्षकों के बीच सक्रिय हैं। वहीं तिरहुत शिक्षक क्षेत्र में वामपंथी नेता संजय कुमार सिंह तीसरी बार किस्मत आजमाने की तैयारी कर रहे हैं। उनका दावा है कि शिक्षकों के मुद्दों पर उन्होंने लगातार संघर्ष किया है और इसका लाभ उन्हें मिलेगा।
दरभंगा शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र भी इस बार सुर्खियों में है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मदन मोहन झा एक बार फिर मैदान में अपनी पकड़ मजबूत करने में जुटे हैं। पिछली बार उन्होंने जदयू उम्मीदवार को हराकर जीत दर्ज की थी। इस बार भी उनका मुकाबला दिलचस्प होने की संभावना है।
सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में भी समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। उपचुनाव में जीत दर्ज करने वाले आफाक अहमद अपनी जमीन मजबूत करने में लगे हैं। वहीं दिवंगत शिक्षक नेता केदार पांडे की राजनीतिक विरासत भी इस क्षेत्र में अब भी प्रभाव रखती है। उनके पुत्र आनंद पुष्कर के जदयू में शामिल होने के बाद मुकाबला और दिलचस्प हो गया है।
इन चुनावों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां मतदाता संख्या सीमित होती है। चार स्नातक क्षेत्रों में कुल लगभग 4.85 लाख मतदाता हैं, जबकि चार शिक्षक क्षेत्रों में करीब 45 हजार वोटर ही हैं। ऐसे में चुनावी रणनीति का पूरा खेल मतदाता सूची, व्यक्तिगत संपर्क और मतदान केंद्र तक वोटरों को पहुंचाने की क्षमता पर निर्भर करता है। राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि इन चुनावों में वही उम्मीदवार सफल होता है जो अपने समर्थकों को सिर्फ वोटर नहीं, बल्कि मतदान केंद्र तक पहुंचने वाला सक्रिय समर्थक बना सके।
विधान परिषद की मौजूदा तस्वीर भी इस चुनाव को अहम बना रही है। 75 सदस्यीय सदन में एनडीए के पास स्पष्ट बढ़त है। भाजपा और जदयू मिलाकर सत्ता पक्ष मजबूत स्थिति में है, जबकि राजद, कांग्रेस और वाम दलों के नेतृत्व वाला महागठबंधन अपनी मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश में जुटा है। हाल के कुछ उपचुनावों में विपक्ष को मिली सफलता ने उसके हौसले बुलंद कर दिए हैं। वहीं भोजपुर-बक्सर स्थानीय निकाय क्षेत्र में जदयू को मिले झटके ने सत्ता पक्ष को भी सतर्क कर दिया है।
एनडीए का दावा है कि वह सभी आठ सीटों पर जीत हासिल करेगा। दूसरी ओर महागठबंधन का कहना है कि शिक्षकों और स्नातकों में सरकार के खिलाफ नाराजगी है और उसका फायदा विपक्ष को मिलेगा। सियासत की इस जंग में दावों और वादों की कमी नहीं है, लेकिन अंतिम फैसला वही शिक्षक और स्नातक मतदाता करेंगे जो किसी राजनीतिक लहर से नहीं, बल्कि अपने हित, संवाद और भरोसे के आधार पर वोट देते हैं।
फिलहाल इतना तय है कि नवंबर तक बिहार की राजनीति का एक बड़ा केंद्र यही आठ सीटें रहने वाली हैं। यहां सिर्फ विधान परिषद के सदस्य नहीं चुने जाएंगे, बल्कि यह भी तय होगा कि शिक्षित वर्ग और शिक्षक समुदाय की नब्ज पर किस गठबंधन की पकड़ ज्यादा मजबूत है। यही वजह है कि इस चुनाव को सत्ता और विपक्ष दोनों अपनी-अपनी प्रतिष्ठा का इम्तिहान मानकर पूरी ताकत झोंकने की तैयारी में हैं।
रिपोर्ट- हीरेश कुमार