Baba Ramdev : पटना हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, स्वामी रामदेव पर लिखी किताब के प्रकाशक के खिलाफ आपराधिक मुकदमा किया रद्द

Baba Ramdev : पटना हाईकोर्ट ने योग गुरु स्वामी रामदेव पर आधारित चर्चित किताब के प्रकाशक 'जुगरनॉट बुक्स प्राइवेट लिमिटेड' के खिलाफ चल रहे आपराधिक मुकदमे को रद्द कर दिया है।

Baba Ramdev : पटना हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, स्वामी रामदेव पर
प्रकाशक के खिलाफ मुकदमा रद्द - फोटो : SOCIAL MEDIA

PATNA : पटना हाईकोर्ट ने स्वामी रामदेव पर लिखी किताब ‘गॉडमैन टू टायकून : द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ स्वामी रामदेव’ के प्रकाशक जुगरनॉट बुक्स प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ चल रहा आपराधिक मुकदमा को रद्द कर दिया। जस्टिस आलोक कुमार सिन्हा की एकलपीठ ने प्रकाशक की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई के बाद कहा कि रामदेव के अनुयायी होने के नाते कोई व्यक्ति मानहानि का केस दायर नहीं कर सकता।

वैशाली जिले के हाजीपुर में एक शिकायत 2017 में दर्ज की गई थी। शिकायतकर्ता अमित कुमार का कहना था कि वह स्वामी रामदेव के अनुयायी हैं। 1 सितंबर, 2017 को बाजार में उन्होंने एक किताब देखी और उसे खरीदी। किताब में स्वामी रामदेव को गरीब किसान का अनपढ़ बेटा बताया गया, उनके भगवा वस्त्र धारण करने और गुरु शंकरानंद, स्वामी योगानंद और राजीव दीक्षित की मौत के लिए परोक्ष रूप से जिम्मेदार ठहराए जाने जैसे आरोप लगाए गए। इससे उनकी और हिंदू धर्म की भावनाएं आहत हुईं।

इस शिकायत पर हाजीपुर के अपर मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी-द्वितीय ने 7 अक्टूबर, 2017 को आईपीसी की धारा 295-ए, 500, 501 और 502 के तहत संज्ञान लिया। प्रकाशक की ओर से वरीय अधिवक्ता आशीष गिरी ने कोर्ट को बताया कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 199(1) के तहत मानहानि का दावा सिर्फ ‘पीड़ित व्यक्ति की शिकायत पर शुरू की जा सकती हैं।

कानून के अनुसार अनुयायी पीड़ित व्यक्ति नहीं हो सकता हैं। उनका कहना था की धारा 295-ए के तहत संज्ञान के लिए केंद्र या राज्य सरकार की पूर्व अनुमति आवश्यक है, जो इस केस में नहीं ली गई। कोर्ट ने उनके दलीलों को मंजूर करते हुए कहा कि शिकायत में कहीं भी शिकायतकर्ता के खिलाफ कोई टिप्पणी नहीं है, सारे आरोप स्वामी रामदेव पर लगाये गए हैं। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि शिष्य का गुरु के अपमान से आहत होना उसे कानूनी रूप से पीड़ित व्यक्ति नहीं मानता। कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में मुकदमा चलने देना कोर्ट की प्रक्रिया का दुरुपयोग हैं। कोर्ट ने संज्ञान आदेश और उससे जुड़ी पूरी कार्यवाही को रद्द कर दिया।