आरक्षण पर चिराग-मांझी में सिरफुटव्वल की असली वजह ये, पासवान आगे, पीछे रह गए मांझी क्या...

Bihar Politics: आरक्षण को लेकर बिहार की सियासत में एक नया विवाद खड़ा हो गया है।...

Chirag vs Santosh Is Reservation a Vote Bank Battle
आरक्षण पर चिराग-मांझी में सिरफुटव्वल की असली वजह- फोटो : social Media

Bihar Politics: आरक्षण को लेकर बिहार की सियासत में एक नया विवादखड़ा हो गया है। एक तरफ केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान साफ लहजे में कहते हैं कि आरक्षण की समीक्षा कतई नहीं होनी चाहिए, तो दूसरी तरफ डॉ.संतोष सुमन इसके ठीक उलट आरक्षण में समीक्षा और हिस्सेदारी के नए फॉर्मूले की पैरवी कर रहे हैं। सवाल यही है दोनों की मंजिल दलित हित है या अपने-अपने वोटबैंक की हिफाजत? चिराग पासवान का बयान आता है कि आरक्षण पर समीक्षा एकदम नहीं होना चाहिए । तो डॉ संतोष सुमन कहते हैं कि आरक्षण पर समीक्षा होनी चाहिए । दलितों के दो नेता आखिर आरक्षण पर दो राय क्यों रख रहे हैं । सही में दोनों को आरक्षण की चिंता है या अपने-अपने वोटबैंक की ।

पहले आरक्षण को विस्तार से समझिए । देश में OBC को 27 फीसदी आरक्षण है । SC- 15 फीसदी, ST-7.5 फीसदी और EWS यानी आर्थिक आधार पर सामान्य वर्ग को 10 फीसदी है । 21 नवंबर 2023 को बिहार में नीतीश कुमार ने विधानसभा में आरक्षण के दायरे को बढ़ाया था । इस कानून के मुताबिक SC का आरक्षण 16 से 20 फीसदी, ST- 1 से 2, OBC- 12 से 18, EBC- 18 से 25 फीसदी कर दिया था । हालांकि कानून बिहार में लागू हो पाता । उससे पहले कोर्ट में ही चैलेंज हो गया । वजह साफ है कि आरक्षण के बढ़े दायरे वाला बिहार का कानून सूबे में तभी लागू हो सकता है कि जब इस कानून को संविधान की 9 वीं अनुसूचि में शामिल किया जाए और ये काम केंद्र सरकार को करना है ।

कुल मिलाकर कहें तो देश में दलितों को 15 फीसदी आरक्षण मिलता है । यानी अगर किसी सरकारी नौकरी में 100 वैकेंसी निकली है । तो उसमें 15 पोस्ट पर दलित समाज से आने वाले युवाओं की ही भर्ती होगी । बिहार में दलित समाज में 22 जातियां है । जीतन राम मांझी या उनके बेटे संतोष सुमन को लगता है कि इन 15 पोस्ट पर भले ही दलित चुने जाते हैं । पर इन 15 पोस्ट पर अधिकतम 4 जाति के लोग ही सलेक्ट होते है । दलित समाज के 22 जाति में 18 जाति को कम मौका मिल पाता है । 18 जाति के लोग शिक्षा के अभाव में बैकफुट पर रह जाते हैं । इसका संतोष सुमन को मलाल है । तभी तो आरक्षण में आरक्षण की मांग कर रहे हैं । मतलब दलितों को जो 15 फीसदी आरक्षण मिला है । उसमें भी तय-तय जातियों के लिए फिक्स कर दिया जाए । यहां सबसे बड़ा सवाल ये है कि दलित समाज की 22 जातियों में वो 4 जाति कौन है, जिसे आरक्षण का फायदा सबसे ज्यादा मिलता है । इस पर जीतनराम मांझी और उनके बेटे डॉ संतोष सुमन चुप हैं । क्या पासवान समाज भी इन्हीं 4 जातियों में आती है । अगर हां तो इसका प्रमाण क्या है ?

 दूसरी ओर चिराग पासवान का कॉनसेप्ट क्लीयर है । आरक्षण जैसा है । वैसा ही रहे । कोई बदलाव नहीं । कोई समीक्षा नहीं । 15 पोस्ट पर दलित में कौन ज्यादा और कौन कम जा रहा है । इससे कोई मतलब नहीं है । 

दिल्ली के जंतर मंतर पर 21 अगस्त को आरक्षण हटाओ आंदोलन किया गया । आंदोलन के बाद आंदोलनकारी युवा पहले यूपी के सीएम ब्रजेश पाठक से मिलते हैं । फिर केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा मिलते हैं । अभी आंदोलन का स्वरूप बदल गया है । सोशल मीडिया पर इस मुद्दे को लेकर जोरदार बहस छिड़ी है । आंदोलन करने वालों युवाओं की मांग है कि आरक्षण की समीक्षा की जाए और आरक्षण जाति के आधार पर नहीं, आर्थिक आधार पर दिया जाए । 

 इस बीच आरक्षण पर चिराग पासवान का सीधा और कड़ा बयान आता है । चिराग कहते हैं- आरक्षण खैरात में मिली कोई चीज नहीं है । इस पर समीक्षा नहीं होनी चाहिए।  वहीं संतोष सुमन कहते हैं कि आरक्षण समीक्षा होनी चाहिए।  बयानबाजी करते-करते दोनों नेता एक-एक दूसरे का इस्तीफा तक मांग रहे हैं ।आरक्षण के संदर्भ में देखें तो बीजेपी का ताजा बयान नहीं आया है । हांलाकि बीजेपी की नीति आरक्षण पर पहले से यही रही है कि मौजूदा आरक्षण में कोई बदलाव नहीं होगा ।

Diwaanshu Prabhat की रिपोर्ट