इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस में बिहार का परचम: अधीक्षण अभियंता डॉ. सुनील चौधरी ने पेश किया 'क्लाइमेट रेजिलिएंस' पर शोध पत्र

'इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस ऑन पब्लिक पॉलिसी एंड मैनेजमेंट' में बिहार के पथ निर्माण विभाग के अधीक्षण अभियंता डॉ. सुनील कुमार चौधरी ने अपना शोध पत्र प्रस्तुत कर वैश्विक मंच पर राज्य का मान बढ़ाया है....

इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस में बिहार का परचम: अधीक्षण अभियंता डॉ.
अधीक्षण अभियंता डॉ. सुनील चौधरी ने बढ़ाया बिहार का मान- फोटो : न्यूज4नेशन

Patna : चंद्रगुप्त प्रबंधन संस्थान पटना (CIMP) के ऑडिटोरियम में आयोजित चौथे 'इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस ऑन पब्लिक पॉलिसी एंड मैनेजमेंट' में बिहार के पथ निर्माण विभाग के अधीक्षण अभियंता डॉ. सुनील कुमार चौधरी ने अपना शोध पत्र प्रस्तुत कर वैश्विक मंच पर राज्य का मान बढ़ाया है। सेंटर ऑफ पब्लिक पॉलिसी (CIMP), पब्लिक फाइनेंस रिसर्च क्लस्टर तथा अमेरिका की जॉर्जिया स्टेट यूनिवर्सिटी के एंड्र्यू यंग स्कूल ऑफ पब्लिक स्टडीज के संयुक्त सहयोग और नीति आयोग (भारत सरकार) के समर्थन से आयोजित इस सम्मेलन में डॉ. चौधरी ने पुरजोर शब्दों में कहा कि विकास ऐसा होना चाहिए जो विनाश से बचाए और पर्यावरण की रक्षा करे।


'क्लाइमेट चेंज एंड सस्टेनेबिलिटी' पर दिया व्याख्यान, समाज के अंतिम व्यक्ति तक तकनीक पहोँचाने का संकल्प

बिहार अभियंत्रण सेवा संघ के पूर्व महासचिव एवं इंडियन इंजीनियर्स फेडरेशन के पूर्व उपाध्यक्ष डॉ. सुनील कुमार चौधरी के शोध पत्र का मुख्य विषय "क्लाइमेट चेंज, एनवायरमेंट एडाप्टेशन एंड सस्टेनेबिलिटी—ए होलिस्टिक एप्रोच टुवर्ड्स क्लाइमेट रेजिलिएंस" था। अपने संबोधन में उन्होंने जलवायु परिवर्तन का सामाजिक असमानता पर पड़ने वाले प्रभावों की विस्तृत व्याख्या की। उन्होंने स्पष्ट किया कि विज्ञान और तकनीक के विभिन्न पहलुओं को समाज की अंतिम पंक्ति में बैठे लोगों तक पहुँचाकर ही एक वास्तविक 'क्लाइमेट रेजिलिएन्ट' (जलवायु सहिष्णु) समाज की परिकल्पना को साकार किया जा सकता है।


टिकाऊ निर्माण के लिए बाँस, जूट और प्लास्टिक के उपयोग पर बल

सस्ता, टिकाऊ और पर्यावरण के अनुकूल निर्माण की वकालत करते हुए डॉ. चौधरी ने बताया कि रेजिलिएन्ट स्ट्रक्चर का प्रबंधन न केवल किफायती है बल्कि दीर्घकालिक भी होता है। उन्होंने आपदा रोधी ग्रामीण आवासों के निर्माण के लिए नवीन और पर्यावरण-हितैषी तकनीकों की व्याख्या की। डॉ. चौधरी ने जोर देकर कहा कि यदि देश में आपदा रोधी निर्माण और प्रबंधन को बढ़ावा देना है, तो निर्माण कार्यों में पारंपरिक सामग्रियों के स्थान पर बाँस (बैम्बु), जूट और रिसाइकिल प्लास्टिक के प्रयोग को बड़े पैमाने पर बढ़ावा देना होगा।


नैनोटेक्नोलॉजी, ग्रीन कंक्रीट और बायो-इंजीनियरिंग के उपयोग से बदलेगी निर्माण नीतियां

भारत को एक बहु-आपदा प्रवण (Multi-hazard prone) देश बताते हुए उन्होंने निर्माण कार्यों के डिजाइन, सामग्री की विशिष्टताओं और प्रबंधन नीतियों में बड़े बदलावों की आवश्यकता बताई। डॉ. चौधरी ने सस्टेनेबल बिल्ट एनवायरमेंट के लिए निर्माण और प्रबंधन में नैनोटेक्नोलॉजी, बायो कंक्रीट, ग्रीन कंक्रीट और बायो-इंजीनियरिंग की महत्ता पर विस्तार से प्रकाश डाला। साथ ही, उन्होंने वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड सोखने वाले पौधों को लगाने, स्थानीय शासन को मजबूत करने, संस्थागत क्षमता बढ़ाने और तकनीक-आधारित समावेशी शासन व्यवस्था लागू करने पर बल दिया।


235 से अधिक शोध पत्र और 28 राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से नवाजे जा चुके हैं डॉ. चौधरी

वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए डॉ. चौधरी ने आपदा रोधी निर्माण के प्रति समाज के हर तबके को जागरूक करने के अभियान को एक जन-आंदोलन का रूप देने की अपील की। वे स्वयं विभिन्न हितधारकों को आपदा प्रबंधन और सुरक्षित भवन निर्माण का बड़े पैमाने पर प्रशिक्षण दे रहे हैं। अब तक राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 235 से अधिक शोध पत्र प्रस्तुत कर चुके और 28 पुरस्कारों से सम्मानित डॉ. चौधरी ने अपने वक्तव्य का समापन इन प्रेरक पंक्तियों के साथ किया— "हम लोग हैं ऐसे दीवाने, तकनीक बदलकर मानेंगे। मंजिल को पाने निकले हैं, मंजिल को पाकर मानेंगे।" कार्यक्रम के अंत में उन्हें प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया गया।