बिहार में खत्म होगी शराबबंदी ! NCAER की रिपोर्ट ने बढ़ाई सरकार की मुश्किलें, 'नीतीश कुमार के फैसले से भारी नुकसान'
बिहार में लागू पूर्ण शराबबंदी को करीब एक दशक पूरा होने के बाद अब इसकी समीक्षा को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। शराबबंदी से कैसे बिहार को बड़ा नुकसान हुआ है इसे लेकर अब आई एक रिपोर्ट ने इस चर्चा को और ज्यादा तेज कर दी है.
Bihar Liquor Ban : मार्च 2026 ने नीतीश कुमार ने बिहार के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने की घोषणा की। उनके ऐलान से जहाँ बिहार में सियासी उलटफेर हो गया वहीं इसके साथ ही एक और बात होने लगी कि क्या बिहार में अब शराबबंदी खत्म होगी। भाजपा के सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के बाद उनसे भी यह सवाल होने लगे कि क्या वे शराबबंदी खत्म करेंगे। अब तक भले ही सीएम सम्राट चौधरी राज्य में शराबबंदी लागू रखने पर अडिग हों लेकिन अब एक रिपोर्ट ने बिहार को शराबबंदी से हो रहे नुकसान पर गंभीर चिंता जताई है। इसके साथ ही शराबबंदी खत्म होने की बातें होने लगी हैं।
बिहार में लागू पूर्ण शराबबंदी को करीब एक दशक पूरा होने के बाद अब इसकी समीक्षा को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। National Council of Applied Economic Research (NCAER) की हालिया अध्ययन रिपोर्ट में राज्य में शराबबंदी खत्म कर नियंत्रित और कर-आधारित शराब बिक्री व्यवस्था बहाल करने की सिफारिश की गई है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि मौजूदा शराबबंदी न तो महिलाओं के खिलाफ अपराध रोकने के अपने मूल उद्देश्य को पूरी तरह हासिल कर सकी है और न ही राज्य को होने वाले बड़े राजस्व नुकसान की भरपाई हो पाई है।
शराबबंदी से राजस्व का भारी नुकसान
NCAER की यह रिपोर्ट पिछले सप्ताह India Policy Forum में पेश की गई। “Macro Perspective of Bihar’s Development Achievements: Unfinished Agenda and the Way Forward” नामक अध्ययन को अर्थशास्त्रियों की टीम ने तैयार किया है, जिसका नेतृत्व रत्ना सहाय ने किया।
इस रिपोर्ट के मुताबिक बिहार में शराबबंदी जारी रहने से राज्य के खजाने को हर साल बड़ी मात्रा में राजस्व का नुकसान हो रहा है। अध्ययन का अनुमान है कि यदि शराबबंदी हटाकर शराब की बिक्री को नियंत्रित किया जाए और उस पर आबकारी कर लगाया जाए, तो राज्य के राजस्व में 14 से 15 फीसदी तक की बढ़ोतरी हो सकती है। बिहार सरकार का सालाना राजस्व करीब 65 हजार करोड़ रुपये बताया गया है। ऐसे में रिपोर्ट की सिफारिश ने शराबबंदी के आर्थिक प्रभाव को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
महिलाओं के खिलाफ जारी है अपराध
बिहार में तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अप्रैल 2016 में पूर्ण शराबबंदी लागू की थी। महिलाओं के खिलाफ अपराध और घरेलू हिंसा पर नियंत्रण शराबबंदी के प्रमुख उद्देश्यों में शामिल था। लेकिन NCAER की रिपोर्ट में कहा गया है कि शराबबंदी अपने इस मूल उद्देश्य को हासिल करने में पूरी तरह सफल नहीं रही। रिपोर्ट के अनुसार, कानूनी रूप से शराब की उपलब्धता बंद होने के बाद अवैध शराब के कारोबार, तस्करी और वैकल्पिक नशीले पदार्थों के इस्तेमाल में तेजी देखी गई। अध्ययन में अवैध और मिलावटी शराब से जुड़े स्वास्थ्य जोखिमों को भी गंभीर चुनौती बताया गया है।
भ्रष्टाचार और पुलिस संसाधनों पर भी असर
NCAER ने शराबबंदी लागू करने में कई व्यावहारिक चुनौतियों का उल्लेख किया है। रिपोर्ट में व्यवस्थित भ्रष्टाचार, कानून-व्यवस्था लागू करने वाली एजेंसियों के संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव और जहरीली/मिलावटी शराब से जुड़े सार्वजनिक स्वास्थ्य जोखिम को प्रमुख समस्याओं में गिनाया गया है। रिपोर्ट की सिफारिश है कि बिहार पूर्ण प्रतिबंध की जगह नियंत्रित शराब बिक्री और आबकारी कर व्यवस्था की ओर लौट सकता है। इससे शराबबंदी लागू कराने में लगे संसाधनों को शिक्षा, स्वास्थ्य, बुनियादी ढांचे और रोजगार जैसे प्राथमिक क्षेत्रों में इस्तेमाल किया जा सकेगा।
विकास की रफ्तार बढ़ी
NCAER की रिपोर्ट ने सिर्फ शराबबंदी ही नहीं, बल्कि बिहार की व्यापक आर्थिक स्थिति का भी आकलन किया है। अध्ययन के मुताबिक, 2005 के बाद बिहार की औसत वार्षिक आर्थिक वृद्धि दर करीब 7.3 फीसदी रही, जबकि इसी अवधि में राष्ट्रीय स्तर पर यह करीब 6.1 फीसदी रही। इसके बावजूद बिहार देश का सबसे गरीब राज्य बना हुआ है और राज्य की प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत की लगभग एक-तिहाई है। हालांकि शराबबंदी के बाद बिहार में आर्थिक रूप से कई प्रकार की चुनौतियाँ आई हैं इसका सीधा असर राज्य की आमदनी पर हुआ है जिससे विकास कई प्रकार से बाधित हुआ है।
ऐसे में शराबबंदी पर NCAER की सिफारिश ने बिहार सरकार के सामने आर्थिक लाभ, कानून-व्यवस्था, सामाजिक प्रभाव और राजनीतिक संवेदनशीलता—इन सभी पहलुओं को एक साथ तौलने की चुनौती खड़ी कर दी है। फिलहाल शराबबंदी हटाने को लेकर सरकार की ओर से कोई आधिकारिक फैसला सामने नहीं आया है।