सत्ता बदली,लेकिन सियासत में नीतीश की पकड़ अब भी कायम! विश्वास मत के बीच सदन में सुशासन बाबू की चर्चा हावी, सदन में गूंजा -दीपक चला गया लेकिन रोशनी बाकी है

Samrat vote of confidence: एक दिवसीय विशेष सत्र में जहां एनडीए खेमे के पास 201 विधायकों का मजबूत समर्थन था, वहीं चर्चा सिर्फ संख्या बल की नहीं, बल्कि एक नाम की होती रही नीतीश कुमार।

Bihar Assembly Echoes Nitish Era Samrat Govt Shows Strength
नीतीशमय..विधानसभा- फोटो : social Media

Samrat vote of confidence:बिहार की सियासत एक बार फिर भावनाओं और रणनीति के दोराहे पर खड़ी दिखी, जब मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने विधानसभा में विश्वास मत पेश किया। एक दिवसीय विशेष सत्र में जहां एनडीए खेमे के पास 201 विधायकों का मजबूत समर्थन था, वहीं चर्चा सिर्फ संख्या बल की नहीं, बल्कि एक नाम की होती रही नीतीश कुमार।

दिलचस्प यह रहा कि नीतीश कुमार भले ही अब सदन का हिस्सा नहीं रहे, लेकिन उनकी राजनीतिक मौजूदगी हर भाषण और हर तर्क में महसूस की जाती रही। सत्ता पक्ष के नेताओं ने कई बार उनके योगदान और नेतृत्व की छाया का जिक्र कर सदन में भावनात्मक माहौल बना दिया। डिप्टी सीएम विजय कुमार चौधरी ने नीतीश कुमार की खुलकर तारीफ करते हुए कहा कि बिहार की राजनीति में ऐसा नेता दुर्लभ है जिसने सत्ता के शिखर पर पहुंचकर खुद आगे बढ़कर नई पीढ़ी को मौका देने का संकेत दिया हो। उन्होंने कहा कि आने वाली पीढ़ियां भी नीतीश कुमार के कामों को याद रखेंगी और उनकी नीतियों को आगे बढ़ाया जाएगा।

विजय चौधरी ने विपक्ष पर निशाना साधते हुए कहा कि तेजस्वी यादव को सिर्फ सत्ता नहीं मिल पाने का मलाल है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि अगर यही स्थिति रही तो आने वाली तीसरी पीढ़ी  भी एनडीए के नेतृत्व में बिहार का संचालन देखेगी। उन्होंने सदन में भावुक अंदाज में कहा कि नीतीश कुमार के जाने के बाद एक खालीपन महसूस हो रहा है, जैसे एक दीपक की रोशनी अचानक दूर हो गई हो, जिसकी आदत सदन को लग चुकी थी।

वहीं राजनीतिक संदेश देते हुए उडिप्टी सीएम विजय कुमार चौधरी ने यह भी स्पष्ट किया कि 2025 से 30 फिर से नीतीश सिर्फ एक नारा नहीं, बल्कि एनडीए की निरंतरता का संकेत है, जिसमें नीतीश कुमार की नीतियों और सोच को आगे बढ़ाया जाएगा। उन्होंने यह भी दावा किया कि इस महीने का नेतृत्व परिवर्तन और सम्राट चौधरी को सत्ता का जिम्मा मिलना लोकतांत्रिक प्रक्रिया की एक मिसाल है, जिसे सुचारू सत्ता हस्तांतरण के रूप में देखा जाना चाहिए।

बहरहास सदन में बहस भले ही फ्लोर टेस्ट को लेकर थी, लेकिन राजनीतिक भावनाओं का केंद्र एक ही नाम रहा नीतीश कुमार, जिनकी गैरमौजूदगी भी बिहार की राजनीति में सबसे ज्यादा मौजूद नजर आई।