Bihar DTO Posting: साहेब का मौजा हीं मौजा,कई जिम्मेदारियों का बोझ अकेले हीं संभाल लेते हैं....मेहरबानी की कहानी क्या है.....

Bihar DTO Posting: क्या प्रदेश के परिवहन विभाग में अफसरों की इतनी किल्लत हो गई है कि हर अहम जिम्मेदारी एक ही शख्स के हवाले करनी पड़ रही है? या फिर यह किसी खास यकीन और मेहरबानी की कहानी है?

Bhagalpur DTO Officer
जिम्मेदारियों की बारिश या मेहरबानी की सियासत?- फोटो : social Media

Bihar DTO Posting: सरकारी गलियारों में इन दिनों एक दिलचस्प दास्तान खूब चर्चा में है। दास्तान ऐसे साहेब की, जिनके कंधों पर जिम्मेदारियां खुद चलकर आती हैं या फिर किसी खास इंतजाम के तहत भेजी जाती हैं। सवाल इसलिए भी उठ रहा है कि जहां कई अफसर एक अदद अतिरिक्त जिम्मेदारी के लिए बरसों तक इंतजार करते रहते हैं, वहीं हुजूर हैं कि जिम्मेदारियों का कारवां उनके दर पर दस्तक देता चला आता है।

कहते हैं कि काबिलियत की पहचान जिम्मेदारियों से होती है, लेकिन जब जिम्मेदारियों की फेहरिस्त इतनी लंबी हो जाए कि लोग गिनते-गिनते थक जाएं, तब चर्चा का बाजार गर्म होना लाजिमी है। जनाब पहले से ही कई अहम दायित्वों का निर्वहन करते रहे हैं। कभी NDC, कभी DSO, कभी आपदा शाखा की जिम्मेदारी, तो कुछ दिन पहले तक DLO का प्रभार भी उनके पास था। ऐसा प्रतीत होता है मानो प्रशासनिक व्यवस्था में वन मैन आर्मी का कोई नया प्रयोग चल रहा हो।

अब परिवहन विभाग के ताजा फरमान ने इस चर्चा को और हवा दे दी है। आदेश जारी हुआ कि विजयन्त, बिहार प्रशासनिक सेवा, जिला परिवहन पदाधिकारी, खगड़िया को अपने वर्तमान कार्यों के अतिरिक्त जिला परिवहन पदाधिकारी, भागलपुर का भी अतिरिक्त प्रभार सौंपा जाता है। यानी खगड़िया की जिम्मेदारी भी और भागलपुर की भी। दोनों जिलों के बीच लगभग 100 किलोमीटर की दूरी है, लेकिन साहेब की प्रशासनिक पहुंच के आगे यह फासला भी शायद बेमानी है।

मगर लोगों के जहन में कुछ सवाल कुलबुला रहे हैं। क्या प्रदेश के परिवहन विभाग में अफसरों की इतनी किल्लत हो गई है कि हर अहम जिम्मेदारी एक ही शख्स के हवाले करनी पड़ रही है? या फिर यह किसी खास यकीन और मेहरबानी की कहानी है? आखिर वह कौन सा राज है कि जिम्मेदारियां भी साहेब को ढूंढती फिरती हैं और साहेब भी उन्हें अपनाने में जरा सी हिचक नहीं दिखाते?

दिलचस्प यह भी है कि जहां कई अधिकारी किसी पद की जिम्मेदारी पाने के लिए वर्षों तक फाइलों और उम्मीदों के सहारे बैठे रहते हैं, वहीं यहां हालात उलट हैं। कुर्सियां मानो खुद चलकर साहेब के दरबार में हाजिरी लगा रही हों। ऐसे में यह चर्चा स्वाभाविक है कि यह महज प्रशासनिक मजबूरी है या फिर किसी खास भरोसे का प्रमाणीकरण।

फिलहाल तो यही कहा जा रहा है कि प्रदेश की प्रशासनिक फिजा में अगर जिम्मेदारियों का कोई सबसे बड़ा आशियाना है, तो वह शायद साहेब का ही दफ्तर है। बाकी, यह मेहरबानी की कहानी है, काबिलियत का करिश्मा है या फिर सियासी-प्रशासनिक समीकरणों का कमाल इसका सरकार, फैसला परिवहन विभाग, लोग और वक्त दोनों मिलकर करेंगे।

रिपोर्ट- धीरज पाराशर