गिरिराज सिंह ने की ऐसी सिफारिश कि शुरू हुआ भारी विरोध, बिहार के इतिहास, सांस्कृति और अस्मिता से खिलवाड़ का आरोप

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर के गाँव सिमरिया को लेकर केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह द्वारा की गई एक सिफारिश का उनके ही लोकसभा क्षेत्र बेगूसराय में भारी विरोध शुरू हो गया है.

Giriraj Singh Bhamashah Statue Proposal
Giriraj Singh Bhamashah Statue Proposal - फोटो : news4nation

Giriraj Singh : केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह के एक प्रस्ताव को लेकर उनके उनके लोकसभा क्षेत्र बेगूसराय में व्यापक विरोध शुरू हो गया है। बेगूसराय के सिमरिया गोलंबर पर दानवीर भामाशाह की प्रतिमा स्थापित करने के प्रस्ताव को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह की ओर से इस संबंध में की गई सिफारिश के सार्वजनिक होने के बाद बिहार, खासकर बेगूसराय के सामाजिक और राजनीतिक हलकों में विरोध के स्वर तेज हो गए हैं। 


जानकारी के अनुसार, केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने सड़क परिवहन एवं राजमार्ग राज्य मंत्री अजय टम्टा को पत्र लिखकर बेगूसराय के सिमरिया गोलंबर पर राष्ट्रभक्त दानवीर भामाशाह की प्रतिमा स्थापित कराने की सिफारिश की है। अपने पत्र में उन्होंने भामाशाह विचार मंच के प्रदेश उपाध्यक्ष प्रेम शंकर के अनुरोध का उल्लेख करते हुए कहा है कि इससे देश की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को सम्मान मिलेगा।

 

सामाजिक संगठनों का विरोध

हालांकि, यह प्रस्ताव सामने आते ही स्थानीय लोगों, युवाओं और विभिन्न सामाजिक संगठनों के बीच इसका विरोध शुरू हो गया। विरोध करने वालों का कहना है कि बेगूसराय और बिहार की धरती ऐसे अनेक महापुरुषों, साहित्यकारों, स्वतंत्रता सेनानियों और समाज सुधारकों की कर्मभूमि रही है, जिन्होंने प्रदेश और देश के लिए उल्लेखनीय योगदान दिया। ऐसे में स्थानीय विरासत से जुड़े स्थान पर किसी ऐसे व्यक्तित्व की प्रतिमा स्थापित करना, जिसका बिहार या बेगूसराय के इतिहास से प्रत्यक्ष संबंध नहीं रहा, उचित नहीं है।


बिहार के नायकों की उपेक्षा 

सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे को लेकर व्यापक चर्चा हो रही है। कई लोगों का कहना है कि दानवीर भामाशाह का भारतीय इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान है, लेकिन उनका बिहार या बेगूसराय के इतिहास से कोई प्रत्यक्ष जुड़ाव नहीं रहा। इसलिए स्थानीय स्मारकों और सार्वजनिक स्थलों पर प्राथमिकता बिहार के महापुरुषों और स्थानीय नायकों को मिलनी चाहिए।


राष्ट्रकवि दिनकर को भूलने का आरोप 

विवाद का सबसे अहम पहलू यह है कि जिस सिमरिया गोलंबर पर प्रतिमा लगाने का प्रस्ताव है, वह राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर के गांव के समीप स्थित है। स्थानीय लोगों का कहना है कि सिमरिया दिनकर की जन्मभूमि और साहित्यिक चेतना का केंद्र माना जाता है। लंबे समय से इस स्थान को दिनकर की स्मृतियों से जोड़कर विकसित किए जाने की मांग होती रही है। विरोध कर रहे लोगों का कहना है कि यदि सिमरिया गोलंबर पर किसी महापुरुष की प्रतिमा स्थापित की जानी है तो वह राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर या बेगूसराय के किसी ऐसे स्थानीय सपूत की होनी चाहिए, जिसने इस क्षेत्र के इतिहास और समाज को नई पहचान दी हो। उनका कहना है कि बाहरी व्यक्तित्व की प्रतिमा स्थापित करने से स्थानीय इतिहास और सांस्कृतिक अस्मिता की उपेक्षा होगी। फिलहाल इस मुद्दे पर राजनीतिक और सामाजिक बहस जारी है। अब यह देखना होगा कि केंद्र सरकार और संबंधित विभाग इस प्रस्ताव पर क्या फैसला लेते हैं।


दानवीर भामाशाह कौन थे?

भामाशाह 16वीं शताब्दी के मेवाड़ के प्रसिद्ध सेनापति, प्रशासक, कोषाध्यक्ष और महान दानवीर थे। उनका जन्म लगभग 1542 ई. में मेवाड़ (वर्तमान राजस्थान) में हुआ था। उनके पिता भारमल, महाराणा उदयसिंह द्वितीय के दरबार में कोषाध्यक्ष थे। भामाशाह का नाम भारतीय इतिहास में इसलिए अमर है क्योंकि उन्होंने महाराणा प्रताप को उस समय आर्थिक सहायता दी, जब वे हल्दीघाटी का युद्ध के बाद कठिन परिस्थितियों से गुजर रहे थे।


क्यों कहलाए 'दानवीर'?

हल्दीघाटी के युद्ध के बाद महाराणा प्रताप आर्थिक संकट में थे। उस समय भामाशाह ने अपनी संचित संपत्ति महाराणा प्रताप को समर्पित कर दी। लोक परंपराओं के अनुसार, यह धनराशि इतनी अधिक थी कि उससे हजारों सैनिकों की सेना का कई वर्षों तक खर्च चल सकता था। इसी महान दान के कारण उन्हें "दानवीर भामाशाह" कहा जाता है। हालांकि इतिहासकारों का स्पष्ट कहना है कि दानवीर भामाशाह का बिहार से कोई सम्बंध नहीं रहा है, न ही उनके द्वारा बिहार में किसी प्रकार का सहयोग दिया गया था।