भोजपुरी के ‘पावर स्टार’ से विधान परिषद तक, आखिर बीजेपी ने पवन सिंह पर क्यों लगाया दांव?
बिहार की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी ने एक ऐसा दांव खेला है जिसकी चर्चा राजनीतिक गलियारों से लेकर भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री तक हो रही है। पार्टी ने भोजपुरी सिनेमा के सुपरस्टार और लोकप्रिय गायक पवन सिंह को बिहार विधान परिषद (एमएलसी) के लिए उम्मीदवार
पटना: बिहार की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी ने एक ऐसा दांव खेला है जिसकी चर्चा राजनीतिक गलियारों से लेकर भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री तक हो रही है। पार्टी ने भोजपुरी सिनेमा के सुपरस्टार और लोकप्रिय गायक पवन सिंह को बिहार विधान परिषद (एमएलसी) के लिए उम्मीदवार बनाया है। उनके साथ संजय मयूख, अनिल कुमार ठाकुर और शीला पंडित को भी उम्मीदवार घोषित किया गया है, लेकिन सबसे अधिक चर्चा पवन सिंह के नाम की हो रही है।
यह फैसला सिर्फ एक कलाकार को राजनीतिक मंच देने भर का नहीं माना जा रहा, बल्कि इसके पीछे भाजपा की दीर्घकालिक राजनीतिक रणनीति भी देखी जा रही है। सवाल यह है कि आखिर बीजेपी ने पवन सिंह को ही क्यों चुना? क्या यह सिर्फ उनकी लोकप्रियता का इनाम है या फिर 2029 के लोकसभा चुनाव की बड़ी तैयारी का हिस्सा?
पवन सिंह को बिहार विधान परिषद (एमएलसी) के लिए उम्मीदवार बनने के बाद
भोजपुरी के सबसे बड़े सितारों में एक हैं पवन सिंह
भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री में पवन सिंह का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। भोजपुर जिले के जोकहरी गांव से निकलकर उन्होंने वह मुकाम हासिल किया है, जहां तक पहुंचना किसी भी क्षेत्रीय कलाकार के लिए आसान नहीं होता।
भोजपुरी संगीत और फिल्मों के क्षेत्र में उन्होंने दो दशक से अधिक समय तक काम किया है। उनकी पहचान सिर्फ बिहार या पूर्वी उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं रही, बल्कि देश और विदेश में भी उनके गानों की लोकप्रियता देखी गई।
उनका सुपरहिट गीत ‘लॉलीपॉप लागेलू’ भोजपुरी संगीत का ऐसा गाना माना जाता है जिसने भाषा और क्षेत्र की सीमाओं को तोड़ दिया। यह गीत सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी लोकप्रिय हुआ। कई बॉलीवुड आयोजनों, वेब सीरीज और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर भी इस गाने का व्यापक इस्तेमाल हुआ।
यही वजह है कि पवन सिंह आज भोजपुरी इंडस्ट्री के सबसे बड़े "क्राउड पुलर" कलाकारों में गिने जाते हैं।
बीजेपी के लिए क्यों महत्वपूर्ण हैं पवन सिंह?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा ने पवन सिंह की लोकप्रियता को लंबे समय से करीब से देखा है। बिहार और पूर्वांचल के लाखों युवाओं के बीच उनकी जबरदस्त पकड़ है।
राजनीति में आज सिर्फ संगठन या जातीय समीकरण ही नहीं, बल्कि जन-स्वीकृति और स्टार अपील भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। पवन सिंह इन दोनों कसौटियों पर खरे उतरते दिखाई देते हैं।
शाहाबाद क्षेत्र—जिसमें आरा, बक्सर, सासाराम और काराकाट जैसे इलाके शामिल हैं—में उनका बड़ा प्रभाव माना जाता है। इसके अलावा उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल क्षेत्र में भी उनकी अच्छी-खासी लोकप्रियता है।
भाजपा के लिए यह एक ऐसा चेहरा है जो चुनावी सभाओं में भीड़ जुटाने की क्षमता रखता है और पार्टी के संदेश को आम लोगों तक पहुंचाने में मदद कर सकता है।
आसनसोल से टिकट मिला, लेकिन चुनाव नहीं लड़ा
लोकसभा चुनाव 2024 के दौरान भाजपा ने पश्चिम बंगाल की आसनसोल सीट से पवन सिंह को उम्मीदवार बनाया था। यह फैसला उस समय भी काफी चर्चा में रहा था।
हालांकि उम्मीदवार घोषित होने के बाद कुछ पुराने भोजपुरी गीतों और विवादों को लेकर सोशल मीडिया पर विरोध शुरू हो गया। इसके बाद पवन सिंह ने खुद चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया और पार्टी का टिकट वापस कर दिया।
राजनीतिक तौर पर यह भाजपा के लिए असहज स्थिति थी, लेकिन इसके बावजूद पार्टी और पवन सिंह के रिश्तों में कोई बड़ी दूरी नहीं आई।
काराकाट से निर्दलीय चुनाव लड़कर दिखाई ताकत
विधानसभा चुनाव 2025 से पहले भजपा में वापसी के बाद उपेंद्र कुशवाहा और पवन सिंह
आसनसोल से पीछे हटने के बाद पवन सिंह ने बिहार की काराकाट लोकसभा सीट से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ने का फैसला किया।
हालांकि वे चुनाव जीत नहीं पाए, लेकिन उन्होंने मजबूत प्रदर्शन किया और एनडीए उम्मीदवार रहे उपेंद्र कुशवाहा को कड़ी टक्कर दी। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उस चुनाव ने यह साबित कर दिया कि पवन सिंह सिर्फ मनोरंजन जगत का चेहरा नहीं हैं, बल्कि उनकी अपनी राजनीतिक स्वीकार्यता भी है।
काराकाट चुनाव के नतीजों के बाद यह चर्चा तेज हुई कि अगर भाजपा उन्हें बिहार में किसी सीट से मैदान में उतारती तो परिणाम अलग हो सकते थे।
2025 विधानसभा चुनाव में बीजेपी के लिए किया प्रचार
गृह मंत्री अमित शाह और पवन सिंह
लोकसभा चुनाव के बाद भी पवन सिंह भाजपा के साथ जुड़े रहे। 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में उन्होंने पार्टी के पक्ष में कई जनसभाएं कीं।
उन्होंने हेलीकॉप्टर से चुनाव प्रचार किया, रोड शो में हिस्सा लिया और कई उम्मीदवारों के समर्थन में सभाएं कीं। इन कार्यक्रमों में बड़ी संख्या में लोगों की मौजूदगी देखने को मिली।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि भाजपा ने उनके इसी योगदान को ध्यान में रखते हुए उन्हें विधान परिषद भेजने का फैसला किया है।
क्या 2029 लोकसभा चुनाव की तैयारी है?
भाजपा के इस फैसले को सिर्फ एमएलसी पद तक सीमित नहीं माना जा रहा है।
राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि पार्टी भविष्य में उन्हें लोकसभा चुनाव में भी बड़ी भूमिका दे सकती है। विशेष रूप से आरा लोकसभा सीट को लेकर लंबे समय से कयास लगाए जाते रहे हैं।
पूर्व केंद्रीय मंत्री आरके सिंह की हार के बाद शाहाबाद क्षेत्र में भाजपा को एक प्रभावशाली चेहरे की तलाश थी। ऐसे में पवन सिंह उस खाली स्थान को भरते दिखाई देते हैं।
यदि आने वाले वर्षों में उनकी राजनीतिक सक्रियता बढ़ती है तो 2029 के लोकसभा चुनाव में उन्हें उम्मीदवार बनाए जाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
सामाजिक समीकरण में भी फिट बैठते हैं पवन सिंह
भाजपा के लिए पवन सिंह की उपयोगिता सिर्फ उनकी लोकप्रियता तक सीमित नहीं है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि वह शाहाबाद क्षेत्र में राजपूत समाज के एक प्रभावशाली चेहरे के रूप में भी देखे जाते हैं। बिहार की राजनीति में जातीय समीकरण हमेशा महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं।
ऐसे में एक लोकप्रिय कलाकार और प्रभावशाली सामाजिक पहचान वाले नेता के रूप में पवन सिंह भाजपा के लिए दोहरा फायदा देने वाले चेहरे साबित हो सकते हैं।
विवादों से भी रहा है गहरा नाता
पवन सिंह का करियर जितना सफल रहा है, उतना ही विवादों से भी घिरा रहा है।
पहली पत्नी नीलम सिंह की मौत
दिसंबर 2014 में उनकी शादी नीलम सिंह से हुई थी। शादी के कुछ ही महीनों बाद मार्च 2015 में नीलम सिंह ने आत्महत्या कर ली थी।
यह घटना उस समय काफी चर्चा में रही थी। हालांकि आज तक यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो सका कि आत्महत्या के पीछे क्या कारण थे।
अक्षरा सिंह के साथ विवाद
भोजपुरी अभिनेत्री अक्षरा सिंह और पवन सिंह
भोजपुरी अभिनेत्री अक्षरा सिंह के साथ उनके संबंध और बाद में हुए विवाद ने भी खूब सुर्खियां बटोरी थीं।
दोनों कलाकारों के बीच रिश्ते की चर्चा लंबे समय तक होती रही। बाद में दोनों अलग हो गए और मीडिया में एक-दूसरे पर कई आरोप भी लगाए गए। यह विवाद भोजपुरी इंडस्ट्री के सबसे चर्चित विवादों में गिना जाता है।
दूसरी पत्नी ज्योति सिंह के साथ तलाक विवाद
2018 में पवन सिंह ने ज्योति सिंह से दूसरी शादी की।
लेकिन यह रिश्ता भी अधिक समय तक नहीं चल सका। दोनों के बीच विवाद सार्वजनिक रूप से सामने आए और मामला अदालत तक पहुंच गया। वर्तमान में दोनों के बीच तलाक का मामला चल रहा है।
हालांकि लोकसभा चुनाव के दौरान दोनों के बीच सुलह की खबरें भी आई थीं, लेकिन बाद में फिर दूरियां बढ़ गईं।
खेसारी लाल यादव के साथ टकराव
भोजपुरी सुपरस्टार खेसारी लाल यादव और पॉवरस्टार पवन सिंह
भोजपुरी इंडस्ट्री के दो बड़े सितारे पवन सिंह और खेसारी लाल यादव लंबे समय से प्रतिद्वंद्वी माने जाते हैं।
दोनों के बीच मंच से लेकर सोशल मीडिया तक कई बार तीखी बयानबाजी देखने को मिली। आज दोनों कलाकार न तो साथ फिल्म करते हैं और न ही किसी मंच पर एक साथ नजर आते हैं।
अंजलि राघव विवाद
एक प्रमोशनल कार्यक्रम के दौरान हरियाणवी अभिनेत्री अंजलि राघव के साथ जुड़ा एक वीडियो भी काफी विवादों में रहा था।
वीडियो वायरल होने के बाद आलोचना हुई और अभिनेत्री ने सार्वजनिक रूप से नाराजगी जाहिर की थी। बाद में पवन सिंह ने माफी मांगी और मामला शांत हो गया।
क्या विवाद बीजेपी के लिए चुनौती बनेंगे?
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि पवन सिंह के साथ जुड़े विवादों को भाजपा ने जरूर देखा होगा।
लेकिन भारतीय राजनीति में ऐसे कई उदाहरण मौजूद हैं जहां लोकप्रियता और जनाधार विवादों पर भारी पड़ते हैं। यदि किसी नेता या चेहरे की जनता में स्वीकार्यता मजबूत हो तो राजनीतिक दल अक्सर उसके सकारात्मक पक्ष को प्राथमिकता देते हैं।
भाजपा भी संभवतः यही मानकर चल रही है कि पवन सिंह की लोकप्रियता उनके विवादों से कहीं अधिक बड़ी है।
उत्तर प्रदेश में भी भाजपा को मिल सकता है फायदा
पवन सिंह की लोकप्रियता सिर्फ बिहार तक सीमित नहीं है।
उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल क्षेत्र में भी उनके गानों और फिल्मों का बड़ा दर्शक वर्ग है। ऐसे में भाजपा भविष्य में उन्हें यूपी के चुनावी अभियानों में भी प्रमुखता से इस्तेमाल कर सकती है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि भोजपुरी भाषी क्षेत्रों में पवन सिंह पार्टी के लिए स्टार प्रचारक की भूमिका निभा सकते हैं।
बीजेपी के लिए ‘एसेट’ साबित हो सकते हैं पवन सिंह
वरिष्ठ पत्रकारों और राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा ने केवल एक अभिनेता को एमएलसी उम्मीदवार नहीं बनाया है, बल्कि एक ऐसे जनप्रिय चेहरे को राजनीतिक रूप से स्थापित करने की शुरुआत की है जो आने वाले वर्षों में पार्टी के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
पवन सिंह के पास लोकप्रियता है, जनसमर्थन है, भीड़ जुटाने की क्षमता है और सामाजिक समीकरणों में भी उनकी उपयोगिता देखी जा रही है।
यही वजह है कि भाजपा ने उन्हें विधान परिषद का टिकट देकर यह संकेत दिया है कि पार्टी उन्हें सिर्फ प्रचारक नहीं, बल्कि भविष्य के राजनीतिक चेहरे के रूप में भी तैयार कर रही है।
निष्कर्ष
भोजपुरी सिनेमा के मंच से निकलकर बिहार विधान परिषद तक पहुंचने की तैयारी कर रहे पवन सिंह का राजनीतिक सफर अब एक नए दौर में प्रवेश कर चुका है। भाजपा का यह फैसला केवल एक पुरस्कार नहीं बल्कि एक राजनीतिक निवेश माना जा रहा है।
आने वाले वर्षों में यह देखना दिलचस्प होगा कि पवन सिंह सिर्फ एक लोकप्रिय कलाकार बने रहते हैं या फिर बिहार और पूर्वांचल की राजनीति में भी अपनी अलग पहचान स्थापित कर पाते हैं। फिलहाल इतना तय है कि एमएलसी उम्मीदवार बनाए जाने के बाद पवन सिंह एक बार फिर बिहार की राजनीति के सबसे चर्चित चेहरों में शामिल हो गए हैं।