Pitri Paksha Mela: गयाजी में श्राद्धक्रम के तीसरे दिन 5 वेदियों पर पिंडदान करने से जन्म-मरण के चक्र से मिलती है मुक्ति, पढ़िए मोक्ष भूमि की महिमा और क्यों जरूरी है पिंडदान?

Pitri Paksha Mela: हिन्दू सनातन संस्कृति में गयाजी का प्रांगण मोक्ष का धाम माना जाता है। वर्तमान में पितृपक्ष मेला चल रहा है, जिसके चौथे दिन और श्राद्ध के तीसरे दिन उत्तरमानस, दक्षिणमानस, कनखल, उदीची और जिहवालोल जैसी पवित्र वेदियों पर पिंडदान...

GayaJi Pitri Paksha Significance
क्यों जरूरी है पिंडदान? - फोटो : X

Pitri Paksha Mela: हिन्दू सनातन संस्कृति में गयाजी का प्रांगण मोक्ष का धाम माना जाता है। वर्तमान में पितृपक्ष मेला चल रहा है, जिसके चौथे दिन और श्राद्ध के तीसरे दिन उत्तरमानस, दक्षिणमानस, कनखल, उदीची और जिहवालोल जैसी पवित्र वेदियों पर पिंडदान का विशेष विधान है। इन वेदियों पर नियमपूर्वक कर्मकांड करने से पितरों को जन्म-मरण के चक्र से पूर्ण मुक्ति मिल जाती है।

उत्तरमानस से दक्षिणमानस की यात्रा और मौन व्रत का विधान

श्राद्ध अनुष्ठान के दौरान साधक को उत्तरमानस वेदी पर तर्पण और पिंडदान के पश्चात दक्षिणमानस की ओर प्रस्थान करना पड़ता है। इस मार्ग पर जाते समय मौन धारण करने की प्राचीन परंपरा है। इसके पश्चात कनखल, उदीची तथा जिहवालोल वेदियों पर विधिवत अनुष्ठान संपन्न किए जाते हैं। जिहवालोल वेदी से जुड़ी पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान विष्णु ने हैती दैत्य का संहार करने के पश्चात अपनी गदा इसी सरोवर में धोई थी, जिससे इसका महात्म्य और अधिक बढ़ जाता है।

प्रेतशिला वेदी और अकाल मृत्यु से मुक्ति

पितृपक्ष के दौरान प्रेतशिला वेदी पर पिंडदान का अत्यंत विशिष्ट महत्व है। जिन परिवारों में किसी सदस्य की अकाल मृत्यु जैसे हत्या, दुर्घटना, आत्मघाती कदम या गंभीर आकस्मिक बीमारी—हो जाती है, उनकी आत्माएं प्रेत योनि में भटकती रहती हैं। प्रेतशिला पर विधि-विधान से पिंडदान करने पर वे अकाल मृत्यु के बंधन से छूटकर स्वर्गलोक को प्राप्त होती हैं।

गयासुर का गयाजी का प्रादुर्भाव

पौराणिक ग्रंथों और महाभारत के अनुसार, सतयुग में गयासुर नामक एक दैत्य ने कोलाहल पर्वत पर एक पैर पर खड़े होकर कठोर तपस्या की थी। उसकी तपस्या के तेज से तीनों लोक संतप्त हो गए। तब भगवान विष्णु ने प्रकट होकर उसे वरदान दिया कि जो कोई भी उसके दर्शन या स्पर्श करेगा, वह सीधे बैकुंठ को प्राप्त होगा।

इससे यमपुरी खाली होने लगी और सृष्टि का संतुलन बिगड़ने लगा। तब देवताओं के आग्रह पर भगवान विष्णु और ब्रह्मा जी ने गयासुर से यज्ञ के लिए उसके शरीर का दान मांगा। दयालु गयासुर ने बिना किसी संकोच के अपना शरीर अर्पित कर दिया। उसके शरीर को स्थिर रखने के लिए उस पर धर्मशिला पत्थर रखा गया और स्वयं भगवान विष्णु ने अपने चरणों से उसे दबा दिया।

मोक्ष नगरी गयाधाम की स्थापना

गयासुर के इस महान त्याग से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उसे वरदान दिया कि यह क्षेत्र सदा के लिए अत्यंत पवित्र रहेगा और यहां पिंडदान करने वाले व्यक्तियों के सात कुलों के पितरों का उद्धार होगा। इस प्रकार गयाजी सनातन धर्म में शाश्वत मोक्ष की नगरी के रूप में प्रतिष्ठित हुई, जहां साक्षात भगवान विष्णु पितृदेवता के रूप में विराजमान हैं।
हीरेश कुमार