13 साल का दर्द और 'इच्छा मृत्यु' की अनुमति: जब एक लाचार पिता को मांगनी पड़ी अपने ही बेटे की मौत
भारतीय न्यायपालिका ने Death with Dignity के अधिकार को लेकर एक अत्यंत संवेदनशील और अभूतपूर्व फैसला सुनाया है, जो आने वाले समय में एक मिसाल बनेगा।
यह कहानी गाजियाबाद के राजनगर एक्सटेंशन की है, जहाँ 30 वर्षीय हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से बिस्तर पर थे। साल 2013 में बीटेक फाइनल ईयर के छात्र और एक होनहार वेटलिफ्टर हरीश, चंडीगढ़ में एक पीजी की चौथी मंजिल से गिर गए थे। जिस छात्र को अगले दिन खेल के मैदान में मुकाबला करना था, वह नियति के क्रूर खेल के कारण अस्पताल के बिस्तर पर पहुँच गया। तब से हरीश न हिल सकते थे और न बोल सकते थे, वे एक जीवित लाश की तरह जीवन जीने को मजबूर थे।
इलाज का भारी बोझ और आर्थिक बदहाली
हरीश की देखभाल के लिए परिवार ने अपनी पूरी जमा-पूंजी लगा दी, लेकिन सुधार की कोई गुंजाइश नहीं दिखी। उनके इलाज और देखभाल का मासिक खर्च लगभग 60,000 रुपये था (नर्स, फिजियोथेरेपी और दवाइयां), जबकि पिता अशोक राणा की मासिक पेंशन महज 3,500 रुपये है। सरकार से कोई ठोस मदद न मिलने और लाखों के कर्ज ने परिवार को न केवल आर्थिक रूप से बल्कि मानसिक रूप से भी पूरी तरह तोड़ दिया। छोटे बेटे की निजी नौकरी के भरोसे पूरा घर और हरीश का इलाज चल रहा था।
कानूनी लड़ाई और इच्छा मृत्यु का भारी फैसला
बेटे को तिल-तिल मरते और असहनीय पीड़ा में देख पिता ने भारी मन से कोर्ट में 'इच्छा मृत्यु' (Passive Euthanasia) की गुहार लगाई थी। शुरुआत में जुलाई 2024 में हाई कोर्ट ने इस अपील को खारिज कर दिया था, लेकिन परिवार की दयनीय हालत और मरीज की लाइलाज स्थिति को देखते हुए अंततः इसकी अनुमति मिल गई। यह फैसला देश में उन मरीजों के अधिकारों पर एक नई बहस छेड़ रहा है, जो ऐसी स्थिति में हैं जहाँ जीवन केवल एक मशीनी प्रक्रिया बनकर रह गया है।
परिवार और समाज की भावुक प्रतिक्रिया
इच्छा मृत्यु की अनुमति मिलने के बाद हरीश के पिता ने रुंधे गले से कहा कि एक पिता के लिए अपने बेटे की मृत्यु मांगना सबसे बड़ा दुख है, लेकिन वे उसे 13 साल से मरते हुए देख रहे थे। पड़ोसियों और सोसाइटी के लोगों ने भी इस लंबे संघर्ष में परिवार का साथ दिया है और अब हरीश की शांति के लिए प्रार्थना सभा आयोजित करने की बात कही है। यह मामला एक साथ कई सवाल खड़े करता है—सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की कमी, आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों का संघर्ष और गरिमा के साथ मरने का अधिकार।