Bihar Land Records corruption: जमीन दाखिल-खारिज में ऑनलाइन घूस का खेल बेनकाब, कुर्सी पर अफसर नहीं बिचौलिया बैठा!सरकारी दफ्तर बना दलालों का दरबार?

Bihar corruption case: म्यूटेशन (जमीन दाखिल-खारिज) जैसे जरूरी काम के लिए आम आदमी को बाबुओं के बजाय सीधे दलालों का दरवाजा खटखटाना पड़ता है।...

Katihar Govt Office Scam Bribes in Online Land Records Expos
जमीन दाखिल-खारिज में ऑनलाइन घूस का खेल - फोटो : reporter

Bihar Land Records corruption:  बिहार में भ्रष्टाचार मुक्त सिस्टम के दावे एक बार फिर कटघरे में खड़े हो गए हैं। कटिहार के आजमनगर अंचल कार्यालय से जो तस्वीर सामने आई है, वह किसी अंडरकवर ऑपरेशन से कम नहीं लगती। यहां सरकारी कुर्सी पर अफसर कम, बल्कि बिचौलियों का कब्जा ज्यादा नजर आ रहा है और खेल भी ऐसा कि सब कुछ डिजिटल घूस के जरिए अंजाम दिया जा रहा है।

स्थानीय लोगों के मुताबिक, इस अंचल कार्यालय में बिना नजराना दिए कोई फाइल आगे नहीं बढ़ती। म्यूटेशन (जमीन दाखिल-खारिज) जैसे जरूरी काम के लिए आम आदमी को बाबुओं के बजाय सीधे दलालों का दरवाजा खटखटाना पड़ता है। कटाक्ष की बात यह है कि ये बिचौलिये खुलेआम सरकारी दफ्तर के भीतर बैठकर काम करते हैं, जैसे उन्हें कोई आधिकारिक इजाजत मिली हो। आरोप है कि बाबुओं के इशारे पर ये‘डिजिटल दलाल ऑनलाइन ट्रांजैक्शन के जरिए मोटी रकम वसूलते हैं। एक मामला तो ऐसा सामने आया है, जिसमें म्यूटेशन कराने के नाम पर करीब 30 हजार रुपये सीधे बिचौलिये के खाते में ट्रांसफर करवाए गए। यानी अब रिश्वत भी कैश से कैशलेस हो चुकी है और सिस्टम इसे रोकने के बजाय मानो खामोशी से देख रहा है।

इस पूरे खेल में सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि सरकारी दफ्तर की कुर्सियों पर बैठकर बिचौलिये खुद को मिनी अफसर समझते हुए लोगों की फाइलें निपटा रहे हैं। आम जनता के लिए यह दफ्तर अब सेवा का केंद्र नहीं, बल्कि दलाली का अड्डा बन चुका है। जब मामला उजागर हुआ, तो जिलाधिकारी ने जांच के आदेश जरूर दिए हैं और कार्रवाई का भरोसा भी दिलाया है। लेकिन सवाल वही पुराना है क्या जांच के बाद सच में ‘बड़े चेहरे’ सामने आएंगे या फिर यह मामला भी फाइलों में दफन होकर रह जाएगा?

कटिहार का यह मामला साफ इशारा कर रहा है कि सिस्टम के अंदर ‘दलाल तंत्र’ किस तरह जड़ें जमा चुका है। और जब सरकारी कुर्सी पर बैठकर ही बिचौलिया राज करने लगे, तो फिर भ्रष्टाचार के खिलाफ दावे सिर्फ कागजों की हेडलाइन बनकर रह जाते हैं।

रिपोर्ट- श्याम कुमार सिंह