बिहार में गरीबों के निवाले पर बड़ा सवाल: वैशाली और बेलसर के गोदामों में सड़ रहा चावल, मंत्री के बयान से खुली वितरण प्रणाली की पोल

बिहार की PDS और अन्न वितरण व्यवस्था एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में आ गई है। एसएफसी गोदामों में हजारों क्विंटल चावल खराब हो रहा है। यहां काम करने वाले मजदूरों ने भी माना है कि यह चावल खाने योग्य नहीं है.....

बिहार में गरीबों के निवाले पर बड़ा सवाल: वैशाली और बेलसर के
बिहार में गरीबों के निवाले पर बड़ा सवाल- फोटो : रिषभ कुमार

Vaishali : बिहार की सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) और अन्न वितरण व्यवस्था एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में आ गई है। राज्य सरकार द्वारा गरीबों को मुफ्त और रियायती दरों पर अनाज उपलब्ध कराने के लिए सालाना लाखों टन चावल का वितरण किया जाता है, लेकिन धरातल पर इस अनाज की गुणवत्ता पर बड़ा प्रश्नचिह्न लग गया है। हाल ही में पटना में आयोजित एक उच्चस्तरीय बैठक के दौरान राज्य के अनुसूचित जाति-जनजाति कल्याण मंत्री लखेंद्र रौशन ने इस गंभीर मुद्दे को उठाते हुए व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी है। उन्होंने कहा कि स्थिति यह है कि कई जगहों पर गोदामों में रखा चावल इस हद तक खराब हो चुका है कि उसे कबूतर और पशु भी नहीं खा रहे हैं।


बेलसर, सहदेई बुजुर्ग और महनार से सामने आई गंभीर लापरवाही की तस्वीरें

  • बेलसर प्रखंड एसएफसी गोदाम: पहली तस्वीर बेलसर प्रखंड स्थित राज्य खाद्य निगम (SFC) के सीएमआर (CMR) गोदाम की है, जहां हजारों क्विंटल अरवा चावल रखे-रखे सड़ रहा है। गोदाम में काम करने वाले मजदूरों ने भी इस बात को स्वीकार किया है कि यह चावल पूरी तरह खराब हो चुका है और इंसानों के खाने के बिल्कुल योग्य नहीं है। इसके बावजूद इस सड़े हुए अनाज को जन वितरण प्रणाली (PDS) की दुकानों के जरिए गरीबों तक भेजने की तैयारी है।


  • सहदेई बुजुर्ग और महनार का हाल: वैशाली जिले के सहदेई बुजुर्ग से दूसरी तस्वीर सामने आई है, जहां राशन कार्डधारियों और पीडीएस दुकानदारों द्वारा कम तौल (कम वजन) और चावल में कीड़े मिलने को लेकर जमकर हंगामा किया गया। इसी तरह महनार क्षेत्र से भी राशन में गड़बड़ी और खराब गुणवत्ता की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं, लेकिन प्रशासनिक स्तर पर समाधान के नाम पर केवल खानापूर्ति हो रही है।


क्या गरीबों की यह योजना सिर्फ लूट-खसोट और धन उगाही का जरिया?

राज्य में चल रही इस कल्याणकारी योजना की असलियत को लेकर अब यह सवाल उठने लगा है कि क्या यह गरीबों का पेट भरने के लिए है या फिर अधिकारियों, मिलरों और सिस्टम से जुड़े रसूखदारों के लिए धन उगाही और भ्रष्टाचार का जरिया बन चुकी है। जानकारों का मानना है कि इस पूरे खेल में केवल बिहार राज्य खाद्य निगम (SFC) के जिला प्रबंधक ही एकमात्र दोषी नहीं हैं, बल्कि वे इस पूरी श्रृंखला का एक मोहरा मात्र हैं।


जिलाधिकारी और राइस मिलरों की भूमिका की उच्चस्तरीय जांच की मांग

भ्रष्टाचार के इस पूरे नेक्सस को बेनकाब करने के लिए केवल निचले स्तर के अधिकारियों पर कार्रवाई करने से बात नहीं बनेगी। जानकारों का कहना है कि यदि मामले की निष्पक्ष जांच करानी है, तो जिला प्रशासन, संबंधित जिलाधिकारी और चावल आपूर्ति करने वाले राइस मिलरों की भूमिका की गहराई से पड़ताल करनी होगी। तभी इस गोरखधंधे के असली मास्टरमाइंड बेनकाब हो सकेंगे। 


फिलहाल, इस पूरे प्रकरण के सामने आने के बाद प्रशासनिक हलकों में हड़कंप मचा हुआ है और जिलाधिकारी के डर से कोई भी अधिकारी खुलकर बोलने को तैयार नहीं है।


रिषभ की रिपोर्ट