Bihar Flood: राहत बांटने पहुंचे थानेदार को चढ़ा गुस्सा! बाढ़ पीड़ितों पर तानी पिस्टल! लोगों का फूटा आक्रोश....मारो गोली, मारो गोली... वायरल वीडियो से मचा हड़कंप

Bihar Flood: जलप्रलय के आगोश में बिहार का सारण जिला आज सिस्टम के खोखले दावों की ऐसी पूरी दास्तान बयां कर रहा है, थानाध्यक्ष को जनता की हिफाजत का जिम्मा सौंपा गया था, वे खुद वर्दी की हनक दिखाते हुए भीड़ के सामने पिस्टल कॉक करते नजर आए।

Bihar Flood
सारण का सैलाब और थानेदार की पिस्टल- फोटो : social Media

Bihar Flood: जलप्रलय के इस आगोश में बिहार का सारण जिला आज सिस्टम के खोखले दावों की ऐसी पूरी दास्तान बयां कर रहा है, जहाँ इंसानी बेबसी पर पुलिस की संवेदनहीनता खुलकर हंस रही है। आसमान से बरसती आफत और जमीन पर उमड़ते बाढ़ के बीच जब जनता दाने-दाने को मोहताज होकर सड़क पर उतरी, तो उन्हें मरहम के बजाय खाकी का खौफ और नेताओं के खोखले आश्वासन नसीब हुए।

मकेर के पुरुषोत्तमपुर में राहत सामग्री बांटने के नाम पर जो तमाशा हुआ, उसने व्यवस्था के चेहरे पर कालिख पोत दी है। जिस मकेर थानाध्यक्ष संग्राम सिंह को जनता की हिफाजत का जिम्मा सौंपा गया था, वे खुद वर्दी की हनक दिखाते हुए भीड़ के सामने पिस्टल कॉक करते नजर आए। जनता के सब्र का बांध टूटा तो उधर से चीखें गूंजीं "मारो गोली, मारो गोली!" यह दृश्य किसी लोकतंत्र की बानगी नहीं, बल्कि उस दबंगई की जीवंत दस्तावेज है जहाँ फरियादियों को इंसाफ के बजाय बुलेट का खौफ दिखाया जाता है। क्या राहत वितरण अब खाकी और लोगों के बीच जंग का मैदान बन चुका है? लोगों एक एक दाने को मोहताज है। कई दिन फाकेकशी में कटे हैं। वीडियो की पुष्टि न्यूज4नेशन नहीं करता है।

सिर्फ पुलिसिया रौब ही नहीं, बल्कि जनप्रितिनिधियों की नुमाइश भी इस त्रासदी में बेनकाब हो गई है। अमनौर के विधायक मंटू सिंह हों या महाराजगंज के सांसद जनार्दन सिंह सिग्रीवाल, बाढ़ पीड़ितों के जख्मों पर मरहम लगाने पहुंचे इन नेताओं को जनता के गुस्से की आग का सामना करना पड़ा। जब  जिला अधिकारी  और पुलिस अधीक्षक  खुद मैदान में उतरे, तो पब्लिक ने साफ बता दिया कि कागजी दावों और जमीनी हकीकत के बीच कोसों की खाई है।

मुफ्त के भाषणों और राहत के नाम पर मिलने वाले चंद बोरों से जनता का पेट नहीं भरता। बाढ़ की विभीषिका ने लोगों के आशियाने उजाड़ दिए हैं, फसलें तबाह कर दी हैं, और सिस्टम है कि अपनी नाकामी छिपाने के लिए महज़ लीपापोती में जुटा है। जब लोग अपने हक की भीख मांगती है, तो हुकूमत उन्हें मुजरिम समझकर डराने लगती है।पिस्टल तान दिया जाता है। 

यह बाढ़ पीड़ितों की कैसी सहबायता  है जहाँ राहत महज़ एक सियासी शिगूफा बनकर रह गई है और जनता का आक्रोश हर तरफ लाचार आंसू बहा रहा है? लोगों का कहना है कि अगर वक्त रहते इस प्रशासनिक लापरवाही और तानाशाही रवैये पर लगाम नहीं कसी गई, तो यह जलप्रलय सियासत के सिंहासन को भी बहा ले जाने में देर नहीं लगाएगा।