Court Wali Mai Temple Chapra: अंग्रेजों के जमाने से चली आ रही परंपरा, महादलित परिवार संभाल रहा पूजा की कमान

छपरा का 'कोर्ट देवी मंदिर', जहां मां के दरबार में केवल मन्नतें ही नहीं मांगी जातीं, बल्कि आपसी विवादों का भी निपटारा होता है। अंग्रेजों के काल से जुड़ी इस न्याय परंपरा और महादलित पुजारी की अनूठी कहानी। जानिए इस मंदिर का पूरा इतिहास।

Court Wali Mai temple Chapra
छपरा का अनोखा 'कोर्ट देवी मंदिर', जहां मां को साक्षी मानकर सुलझाए जाते हैं आपसी विवाद- फोटो : Reporter

बिहार के सारण जिले में एक ऐसा मंदिर है, जहां आस्था के साथ न्याय की परंपरा भी जुड़ी हुई है। यहां मां दुर्गा के दरबार में भक्त सिर्फ पूजा- अर्चना और मन्नतें मांगने नहीं आते, बल्कि आपसी विवादों के समाधान के लिए भी पहुंचते हैं। मान्यता है कि माता के सामने झूठ बोलने से बचना चाहिए, क्योंकि यहां लिए गए फैसलों को लोग देवी का न्याय मानकर स्वीकार करते हैं। यही वजह है कि इस मंदिर को लोग ‘कोर्ट वाली माई’ के नाम से जानते हैं। मंदिर की एक और खासियत है कि यहां मुख्य पुजारी महादलित समुदाय से आते हैं। छपरा के भगवान बाजार थाना क्षेत्र के रतनपुरा मोहल्ले में स्थित यह मंदिर धार्मिक आस्था, सामाजिक समरसता और स्थानीय न्याय परंपरा का अनूठा उदाहरण है।


अंग्रेजों के जमाने से जुड़ी है न्याय की परंपरा

स्थानीय लोगों के अनुसार, कोर्ट देवी मंदिर का इतिहास करीब ढाई सौ साल पुराना माना जाता है। मंदिर के ट्रस्टी सदस्यों में शामिल नागेंद्र पाण्डेय बताते हैं कि काफी पहले मंदिर के समीप खुदाई के दौरान एक शिला मिली थी। उस शिला पर माता की प्रतिमा जैसी आकृति दिखाई दी। इसके बाद यहां माता की स्थापना की गई और धीरे-धीरे यह स्थान श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बन गया। स्थानीय बैकुंठ नंद उपाध्याय के मुताबिक, अंग्रेजों के शासनकाल में रतनपुरा क्षेत्र में तत्कालीन स्टेट की ओर से अदालत लगाई जाती थी। उस समय त्रिभुवनानंद उपाध्याय का स्टेट यहां संचालित था और न्यायिक फैसले भी इसी इलाके में किए जाते थे।


स्थानीय मान्यता के अनुसार, अदालत की परंपरा के दौरान माता को साक्षी मानकर फैसले सुनाने की प्रथा शुरू हुई। इसी ऐतिहासिक जुड़ाव के कारण मंदिर का नाम कोर्ट देवी पड़ा। समय के साथ अंग्रेजों के जमाने की अदालत की व्यवस्था समाप्त हो गई, लेकिन माता को साक्षी मानकर विवाद सुलझाने की परंपरा स्थानीय समाज में बनी रही। आज भी जब किसी मामले को लेकर दोनों पक्ष आपसी सहमति से पंचायत करते हैं, तो मंदिर परिसर को इसके लिए उपयुक्त स्थान माना जाता है।


माता को साक्षी मानकर होती है पंचायती

कोर्ट देवी मंदिर की सबसे खास पहचान यहां होने वाली पंचायती है। स्थानीय लोगों के अनुसार, जब दो पक्षों के बीच किसी विवाद को लेकर सहमति नहीं बनती, तो वे लोग मंदिर परिसर में पहुंचते हैं। दोनों पक्ष माता के सामने अपनी बात रखते हैं और एक- दूसरे के सामने अपना पक्ष स्पष्ट करते हैं। इसके बाद पंचायत में मौजूद लोग आपसी सहमति से विवाद का समाधान निकालने का प्रयास करते हैं। इस प्रक्रिया में माता को साक्षी मानने की परंपरा का विशेष महत्व है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि देवी के सामने गलत बात रखने से बचना चाहिए। इसी धार्मिक आस्था के कारण कई लोग पंचायत में किए गए निर्णय को स्वीकार कर लेते हैं। हालांकि, यह व्यवस्था स्थानीय सामाजिक परंपरा पर आधारित है, न कि किसी सरकारी न्यायालय की औपचारिक प्रक्रिया पर। इसके बावजूद मंदिर से जुड़ी यह मान्यता आज भी क्षेत्र के लोगों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है।

सातवीं पीढ़ी से पूजा कर रहा महादलित परिवार

मंदिर की दूसरी बड़ी विशेषता यहां की पुजारी परंपरा है। मंदिर के मुख्य पुजारी जीत मांझी महादलित समुदाय से आते हैं। उनका कहना है कि उनके परिवार की सातवीं पीढ़ी माता की पूजा- अर्चना करती आ रही है। उनके अनुसार, अंग्रेजों के जमाने से ही इस मंदिर में महादलित समुदाय के पुजारी पूजा करते रहे हैं। यह परंपरा मंदिर को सामाजिक दृष्टि से भी विशिष्ट बनाती है। भारतीय समाज में लंबे समय तक धार्मिक स्थलों पर पूजा- अर्चना और पुजारी की भूमिका को लेकर अलग-अलग सामाजिक धारणाएं रही हैं। ऐसे में एक प्राचीन मंदिर में पीढ़ियों से महादलित परिवार द्वारा पूजा कराया जाना स्थानीय धार्मिक-सामाजिक परंपरा की महत्वपूर्ण पहचान है। पुजारी जीत मांझी बताते हैं कि माता के दरबार में बिहार के विभिन्न क्षेत्रों के अलावा दूसरे राज्यों से भी श्रद्धालु पहुंचते हैं। कुछ लोग अपनी मनोकामना लेकर आते हैं, तो कुछ आपसी विवादों के समाधान के लिए माता के दरबार में हाजिरी लगाते हैं।


भक्तों को न्याय मिलने का विश्वास

मंदिर के पुजारी रंजीत पाण्डेय भी माता के प्रति अपनी गहरी आस्था का अनुभव साझा करते हुए बताया कि एक समय उनका काफी पैसा फंस गया था और उसे वापस पाने का कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था। परेशान होकर वह रात करीब एक बजे अपने माता- पिता के साथ देवी के दरबार में पहुंचे और न्याय की प्रार्थना की। रंजीत पाण्डेय के मुताबिक, अगले ही दिन उनका पैसा वापस मिल गया। वह इस घटना को माता की कृपा और न्याय के रूप में देखते हैं। उनका कहना है कि उनके जैसे अनेक लोग हैं, जो माता के दरबार में अपनी परेशानी लेकर आते हैं और समाधान मिलने का विश्वास लेकर लौटते हैं। ऐसे अनुभव श्रद्धालुओं की आस्था को और मजबूत करते हैं। हालांकि, यह व्यक्तिगत अनुभव और धार्मिक मान्यताएं हैं, जिन्हें वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित तथ्य के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

कुएं के पानी को लेकर भी है मान्यता

कोर्ट देवी मंदिर परिसर में एक पुराना कुआं भी है, जिसे लेकर स्थानीय लोगों में विशेष आस्था है। मान्यता है कि इसके पानी का सेवन करने से घेघा रोग में लाभ मिलता है। इसी विश्वास के चलते दूर-दूर से लोग यहां पानी लेने पहुंचते हैं। स्थानीय श्रद्धालु ममता देवी बताती हैं कि वह पूरे नवरात्र में माता की पूजा करने आती हैं। उनके अनुसार, मंदिर में पूजा करने से मन को शांति मिलती है। यहां माता की सातों बहनों के अलग- अलग मंदिर भी हैं, जहां श्रद्धालु पूजा-अर्चना करते हैं। कुएं के पानी से बीमारी ठीक होने के दावे की चिकित्सकीय पुष्टि उपलब्ध नहीं है। इसलिए किसी बीमारी की स्थिति में केवल इस मान्यता के भरोसे इलाज टालना उचित नहीं है।


आस्था, परंपरा और सामाजिक समरसता का संगम

छपरा का कोर्ट देवी मंदिर अपनी विशिष्ट पहचान के कारण दूसरे धार्मिक स्थलों से अलग नजर आता है। यहां देवी की आराधना के साथ आपसी विवादों को सुलझाने की सामाजिक परंपरा और महादलित समुदाय के पुजारी परिवार की पीढ़ियों पुरानी भूमिका भी जुड़ी हुई है। माता के दरबार में न्याय मिलने का विश्वास, पंचायती फैसलों की परंपरा और सामाजिक सहभागिता इस मंदिर को स्थानीय जनजीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाते हैं। यही कारण है कि कोर्ट देवी मंदिर केवल पूजा-अर्चना का स्थल नहीं, बल्कि आस्था और सामाजिक विश्वास से जुड़ी एक ऐसी विरासत है, जिसे स्थानीय लोग पीढ़ियों से संजोते आ रहे हैं।

सारण से धर्मेंद्र रस्तोगी की रिपोर्ट