Bihar Rice Crisis: आपकी थाली से गायब हो जाएगा चावल? रोटी पर टिकेगा देश? बिहार समेत कई राज्यों में चावल उत्पादन पर मंडरा रहा बड़ा संकट
Bihar Rice Crisis: अल-नीनो का सीधा प्रभाव बिहार पर पड़ेगा जहां धान मुख्य खाद्य और प्रमुख फसल है....
Bihar Rice Crisis: देश पहले से ही कई आर्थिक और पर्यावरणीय चुनौतियों से जूझ रहा है, और अब एक और गंभीर संकट की आहट सुनाई दे रही है। मौसम वैज्ञानिकों और कृषि विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि अल-नीनो की बढ़ती सक्रियता भारत की कृषि व्यवस्था, खासकर चावल उत्पादन पर बड़ा असर डाल सकती है। इसका सीधा प्रभाव बिहार पर पड़ेगा जहां धान मुख्य खाद्य और प्रमुख फसल है। यह सिर्फ मौसम का बदलाव नहीं, बल्कि आने वाले दिनों में खाद्य सुरक्षा बनाम जलवायु अस्थिरता की सीधी टक्कर का संकेत माना जा रहा है।
मौसम विशेषज्ञों और कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि अल-नीनो की स्थिति मानसून की चाल को बिगाड़ सकती है, जिसका सीधा असर देश की सबसे अहम फसल—धान यानी चावल पर पड़ेगा। बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश,ओडिशा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में, जहां चावल ही मुख्य भोजन और जीवन का आधार है, वहां पैदावार में भारी गिरावट का खतरा मंडरा रहा है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के हालिया अध्ययन ने इस संकट को और गंभीर बना दिया है। शोध में पाया गया कि पिछले अल-नीनो वर्षों में करीब 77 जिलों में चावल की पैदावार 10 प्रतिशत से अधिक गिर गई थी, जबकि मक्का उत्पादन 65 जिलों में प्रभावित हुआ। ज्वार और बाजरा जैसी फसलें भी दर्जनों जिलों में बुरी तरह प्रभावित हुईं।
अध्ययन के प्रमुख वैज्ञानिक सुबास पिल्लई ने चेतावनी दी है कि अगर इस बार भी अल-नीनो की स्थिति मजबूत बनी रही, तो खरीफ सीजन में उत्पादन पर गंभीर असर पड़ सकता है। उनका कहना है कि सूखा सहन करने वाली किस्मों, आधुनिक एग्रो-एडवाइजरी सिस्टम और जिला स्तर पर रणनीतिक योजना की तुरंत जरूरत है।
इस बीच उत्तर भारत, खासकर बिहार और आसपास के इलाकों में भीषण गर्मी ने पहले ही हालात खराब कर दिए हैं। तापमान 43 से 45 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचने की संभावना के बीच मौसम विभाग ने येलो अलर्ट जारी किया है। ऐसे में अगर मानसून ने साथ नहीं दिया, तो खेतों में संकट और गहरा सकता है।कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन अब कोई भविष्य की चेतावनी नहीं, बल्कि वर्तमान की हकीकत बन चुका है। अल-नीनो जैसी घटनाएं बार-बार यह साबित कर रही हैं कि पारंपरिक खेती के तरीके अब पर्याप्त नहीं रहे। किसानों को नई तकनीक, कम पानी वाली फसलें और स्मार्ट खेती की ओर ले जाना समय की मांग बन गया है।
सरकार के सामने भी अब दोहरी चुनौती है एक तरफ किसानों की आजीविका बचाना, दूसरी तरफ देश की खाद्य आपूर्ति को स्थिर रखना। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो चावल जैसी मूलभूत फसल की कमी न सिर्फ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को झटका देगी, बल्कि शहरी बाजारों में भी महंगाई का दबाव बढ़ा सकती है।बहरहाल अल-नीनो की यह चेतावनी सिर्फ मौसम का मामला नहीं, बल्कि देश की थाली, थाती और तिजोरी तीनों को प्रभावित करने वाला संभावित संकट बनकर सामने आ रही है।