सहमति से रिश्ता तो बलात्कार कैसा? हाईकोर्ट की निचली अदालतों को फटकार: 'पोस्ट ऑफिस' बनना छोड़ें जज, तय की सहमति संबंधों की लक्ष्मण रेखा
पटना हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि निचली अदालतों को 'पोस्ट ऑफिस' की तरह काम नहीं करना चाहिए और वयस्क जोड़ों के बीच लंबे समय तक रहे सहमति संबंधों को केवल शादी का वादा टूटने पर 'बलात्कार' नहीं माना जा सकता।
Patna - पटना हाईकोर्ट ने बलात्कार से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए निचली अदालतों के लिए एक महत्वपूर्ण नज़ीर पेश की है। कोर्ट ने कहा कि आरोप तय करते समय अदालतों को यांत्रिक ढंग से कार्य करने के बजाय यह देखना चाहिए कि क्या मुकदमे को आगे बढ़ाने के लिए पर्याप्त आधार मौजूद हैं। जस्टिस सोनी श्रीवास्तव ने इस मामले में आरोपी मो. सैफ अंसारी के खिलाफ दर्ज आपराधिक कार्यवाही को पूरी तरह रद्द कर दिया।
लंबे समय तक सहमति संबंध 'बलात्कार' नहीं
अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि यदि एक वयस्क महिला और पुरुष के बीच लंबे समय तक सहमति से शारीरिक संबंध रहे हों, तो केवल विवाह का वादा पूरा न होने की स्थिति में उसे 'बलात्कार' की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। कोर्ट ने माना कि यदि विवाह का वादा शुरुआत में वास्तविक था, लेकिन बाद में परिस्थितियों के कारण पूरा नहीं हो सका, तो उसे स्वतः आपराधिक कृत्य नहीं माना जाना चाहिए।
ट्रायल कोर्ट का दायित्व और साक्ष्यों की जांच
हाईकोर्ट ने निचली अदालतों को चेतावनी देते हुए कहा कि उन्हें किसी "पोस्ट ऑफिस" की तरह सिर्फ कागजों को आगे नहीं बढ़ाना चाहिए। आपराधिक कार्यवाही शुरू करने से पहले यह सुनिश्चित करना ट्रायल कोर्ट का दायित्व है कि अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत सामग्री मुकदमे की कसौटी पर खरी उतरेगी या नहीं। यदि प्रथमदृष्टया कोई ठोस साक्ष्य मौजूद नहीं है, तो अभियुक्त को अनावश्यक कानूनी प्रक्रिया और मुकदमेबाजी से तत्काल मुक्त किया जाना चाहिए।
मुकदमा रद्द करने का आदेश
याचिकाकर्ता मो. सैफ अंसारी की दलीलों को स्वीकार करते हुए कोर्ट ने उनके खिलाफ दर्ज मामले को खारिज कर दिया। इस निर्णय से यह साफ हो गया है कि सहमति से बने संबंधों में कानूनी पेचीदगियों को सुलझाते समय अदालतों को तथ्यों और मंशा (Intent) की गहन पड़ताल करनी होगी, न कि केवल आरोपों के आधार पर मुकदमे को जारी रखना होगा।