Bihar News : बांका में किशोरी से दुष्कर्म की कोशिश का मामला, पटना हाईकोर्ट ने 18 साल बाद आरोपी को किया बरी, पुलिस की घोर लापरवाही हुई उजागर

Bihar News : पटना हाईकोर्ट ने बांका जिले में वर्ष 2008 में दर्ज हुए दुष्कर्म के प्रयास के एक मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए आरोपी को सभी आरोपों से बरी कर दिया है.....जानिए क्या है पूरा मामला

Bihar News : बांका में किशोरी से दुष्कर्म की कोशिश का मामला,
आरोपी बरी - फोटो : SOCIAL MEDIA

PATNA : पटना हाईकोर्ट ने बांका जिले में वर्ष 2008 में दर्ज हुए दुष्कर्म के प्रयास के एक मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए आरोपी को बरी कर दिया है। जस्टिस पूर्णेंदु सिंह की एकल पीठ ने निचली अदालत द्वारा वर्ष 2013 में आरोपी को दी गई तीन साल की सश्रम कारावास की सजा को रद्द कर दिया। कोर्ट ने अपने फैसले में पुलिस और अभियोजन पक्ष की घोर लापरवाहियों को उजागर किया, जिसके कारण आरोपी को संदेह का लाभ देकर बरी करना पड़ा।  ये मामला बांका जिले के अमरपुर थाना कांड संख्या 14/2008 से जुड़ा है। आरोप के अनुसार, 19, जनवरी 2008 को पीड़िता अपने पिता के साथ स्टूडियो' में फोटो खिंचाने गई थी।  ये आरोप था कि स्टूडियो के मालिक हिमांशु कुमार पाठक उर्फ मिथिया पाठक ने पीड़िता को अंदर कमरे में ले जाकर फोटो खींची और उसके पिता को बाहर कंप्यूटर स्क्रीन पर फोटो देखने भेज दिया। इसके बाद आरोपी ने अंदर से दरवाजा बंद कर पीड़िता के साथ जबरदस्ती करने और दुष्कर्म का प्रयास किया। पीड़िता के शोर मचाने पर जब पिता ने दरवाजा धक्का दिया, तो आरोपी वहां से भाग निकला।  

इस मामलें में बांका की तदर्थ अतिरिक्त सत्र न्यायालय ने आरोपी को भादवि की धारा 376/511 और 342 के तहत दोषी पाते हुए सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ आरोपी ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी। हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान पाया कि अभियोजन पक्ष ने जांच और मुकदमे की पैरवी में बुनियादी कानूनी प्रक्रियाओं की पूरी तरह अनदेखी की। जांच अधिकारी का पेश न होना मामले की मुख्य तफ्तीश करने वाले और कोर्ट में चार्जशीट (आरोप पत्र) दाखिल करने वाले वास्तविक जांच अधिकारी को कोर्ट में गवाह के तौर पर परीक्षित ही नहीं किया गया।केवल एक औपचारिक पुलिस.को पेश किया गया, जिसने केवल केस डायरी में एक नोट दर्ज किया था। इस दुष्कर्म के प्रयास जैसे गंभीर आरोपों की पुष्टि के लिए किसी भी चिकित्सा अधिकारी की गवाही नहीं कराई गई। कोर्ट रिकॉर्ड पर कोई भी चिकित्सकीय साक्ष्य उपलब्ध नहीं था।  

अभियोजन पक्ष कुल पांच गवाहों को ही कोर्ट में ला सका। इनमें से एक स्थानीय स्वतंत्र गवाह मुकर गया। पीड़िता की मां घटना की प्रत्यक्षदर्शी नहीं थीं, बल्कि केवल सुनी-सुनाई बातों की गवाह थीं। ये पूरा मामला केवल पीड़िता और उसके पिता के बयानों पर ही टिका रह गया, जिन्हें स्वतंत्र साक्ष्यों का समर्थन नहीं मिला। जस्टिस पूर्णेंदु सिंह ने अपने  फैसले में स्पष्ट किया कि दुष्कर्म से जुड़े मामलों में यद्यपि पीड़िता की एकल गवाही को आधार माना जा सकता है, लेकिन वह गवाही पूरी तरह विश्वसनीय और त्रुटिहीन होनी चाहिए।  

इस मामले में स्वतंत्र गवाहों, वास्तविक जांच अधिकारी और मेडिकल डॉक्टर की अनुपस्थिति ने मामले को बेहद कमजोर कर दिया है। दुष्कर्म के प्रयास के आरोपों को साबित करने वाले सुसंगत वैज्ञानिक या चिकित्सकीय साक्ष्य रिकॉर्ड पर मौजूद नहीं हैं। अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ आरोपों को संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है।कोर्ट ने आरोपी हिमांशु कुमार पाठक को सभी आरोपों से बरी करते हुए उसकी जमानत बांड की देनदारी को समाप्त कर दिया और जमा की गई जुर्माना राशि को भी वापस करने का निर्देश दिया है।