Rajysabha Election : 2022 की वो 'खटास' पड़ेगी भारी या निशांत के लिए हरिवंश की होगी कुर्बानी, नीतीश कुमार की टीस और उपसभापति के लिये बंद हो जायेगा राज्यसभा का दरवाजा

Rajysabha Election : राज्यसभा के लिए हरिवंश का फिर से चयन नहीं किया जायेगा. इसके पीछे सबसे बड़ी वजह यह मानी जा रही है.......पढ़िए आगे

Rajysabha Election : 2022 की वो 'खटास' पड़ेगी भारी या निशांत
हरिवंश का पत्ता कटना तय - फोटो : SOCIAL MEDIA

PATNA : बिहार से राज्यसभा के लिए भाजपा और रालोमो ने अपने उम्मीदवारों का ऐलान कर दिया है, लेकिन सबकी नजरें मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पत्तों पर टिकी हैं। चर्चा है कि राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह को इस बार मौका नहीं मिलेगा। जदयू में 'किंग महेंद्र' को छोड़कर किसी को भी तीसरी बार उच्च सदन भेजने की परंपरा नहीं रही है—चाहे वो आरसीपी सिंह हों या वशिष्ठ नारायण सिंह। एक पत्रकार से प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार और फिर राजनीति के शिखर तक पहुंचे हरिवंश के सामने अब 'आगे क्या' का बड़ा सवाल खड़ा हो गया है।

निशांत कुमार का 'संसदीय राज्याभिषेक' और राजनीतिक संकेत

सियासी गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार को लेकर है। माना जा रहा है कि निशांत को राज्यसभा भेजकर नीतीश अपनी राजनीतिक विरासत को नया मोड़ दे सकते हैं। हालांकि नीतीश कुमार सार्वजनिक मंचों पर परिवारवाद के खिलाफ बोलते रहे हैं और निशांत की राजनीति में एंट्री की खबरों को चुप कराते रहे हैं, लेकिन पार्टी के भीतर उन्हें उच्च सदन भेजने की तैयारी को उनके 'संसदीय राज्याभिषेक' के तौर पर देखा जा रहा है।

रामनाथ ठाकुर पर भरोसा: ईबीसी वोट बैंक को साधने की रणनीति

दूसरी ओर, जननायक कर्पूरी ठाकुर के पुत्र रामनाथ ठाकुर को तीसरी बार राज्यसभा भेजने का निर्णय लगभग तय माना जा रहा है। रामनाथ ठाकुर को फिर से मौका देना नीतीश कुमार की अति पिछड़ी जाति (EBC) की राजनीति का हिस्सा है। ईबीसी मतदाता जदयू के 'कोर वोटर' माने जाते हैं और कर्पूरी ठाकुर की विरासत को सम्मान देकर नीतीश अपने इस आधार को और मजबूत करना चाहते हैं। रामनाथ ठाकुर इस मामले में अपवाद साबित होंगे जिन्हें तीसरी बार मौका मिल सकता है।

2022 की वो 'टीस' जो हरिवंश पर भारी पड़ी

हरिवंश नारायण सिंह की विदाई के पीछे केवल नियम नहीं, बल्कि राजनीतिक दूरियां भी बड़ी वजह हैं। साल 2022 में जब नीतीश ने एनडीए छोड़कर महागठबंधन का दामन थामा, तब हरिवंश ने उपसभापति पद से इस्तीफा नहीं दिया। उन्होंने संवैधानिक मर्यादा का हवाला दिया, लेकिन जदयू नेतृत्व को यह बात नागवार गुजरी। पार्टी के भीतर उन्हें 'भाजपा के प्रभाव' वाला माना जाने लगा, जिसके बाद से नीतीश और हरिवंश के बीच की खाई कभी भर नहीं पाई।

नीतीश के 'चौंकाने वाले' फैसले का इंतजार

भले ही निशांत और रामनाथ ठाकुर के नाम रेस में सबसे आगे हों, लेकिन बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार अपने 'सरप्राइज' फैसलों के लिए जाने जाते हैं। भाजपा ने अपनी लिस्ट में ओबीसी, सवर्ण और दलित समीकरण को साध लिया है, अब गेंद जदयू के पाले में है। क्या नीतीश अपनी पुरानी परंपरा पर कायम रहेंगे या अंतिम समय में हरिवंश को लेकर कोई यू-टर्न लेंगे, इसका खुलासा सूची जारी होने के साथ ही होगा।