Bihar CM Nitish exit plan : पटना से दिल्ली तक सियासी पटकथा, ऐसे बना नीतीश का एग्जिट प्लान, पढ़िए सुशासन बाबू के 20 साल के राज खत्म होने की इनसाइड स्टोरी

Bihar CM Nitish exit plan : मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने दिल्ली जाएंगे, सवाल यही है कि क्या सीएम पद छोड़ने का फैसला अचानक लिया गया या इसके पीछे महीनों से चल रही कोई खामोश सियासी बिसात थी? पढ़िए...

Nitish Exit Plan Shah Strategy Ends 20 Year Rule
ऐसे बना नीतीश का एग्जिट प्लान- फोटो : social Media

Bihar CM Nitish exit plan :  बिहार की सियासत में 5 मार्च 2026 की तारीख एक बड़े मोड़ के तौर पर दर्ज हो गई, जब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राज्यसभा के लिए नामांकन दाखिल कर दिया। इसके साथ ही यह लगभग तय हो गया कि लंबे समय तक बिहार की सत्ता के केंद्र में रहे नीतीश अब सूबे की राजनीति को अलविदा कहकर राष्ट्रीय राजनीति का रुख करेंगे। लेकिन सवाल यही है कि क्या यह फैसला अचानक लिया गया या इसके पीछे महीनों से चल रही कोई खामोश सियासी बिसात थी?

दरअसल सत्ता के गलियारों में चर्चा है कि इस फैसले की पटकथा उसी दिन लिखनी शुरू हो गई थी, जब 25 फरवरी 2026 राजनीतिक समीकरणों का पुनर्मूल्यांकन शुरू हुआ। अंतिम मुहर तब लगी, जब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह सीमांचल के तीन दिवसीय दौरे पर पहुंचे।

किशनगंज में शाह का विशेष विमान उतरा। दिन में उन्होंने सीमा सुरक्षा, खुफिया इनपुट और सुरक्षा हालात की समीक्षा की, लेकिन असली सियासी हलचल रात में हुई। देर रात बिहार सरकार के मंत्री दिलीप जायसवाल के आवास पर एक गोपनीय बैठक हुई। इसमें भाजपा के चुनिंदा रणनीतिकार मौजूद थे। सूत्रों के मुताबिक बैठक में नेताओं ने साफ कहा “सर, बिहार में सरकार अफसर चला रहे हैं।” यही वह क्षण था जब सत्ता के समीकरणों पर गंभीर मंथन हुआ। माना जा रहा है कि इसी दौरान नीतीश कुमार के एग्जिट प्लान पर विस्तार से चर्चा हुई। इसके बाद शाह ने जदयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा और केंद्रीय मंत्री ललन सिंह  के साथ कई दौर की बैठकें कीं। इन बैठकों में बिहार की सत्ता का नया खाका तैयार हुआ और नीतीश को राज्यसभा भेजने की रणनीति पर सहमति बनी।

दरअसल पिछले कुछ महीनों से सरकार पर अफसरशाही के शिकंजे का आरोप लग रहा था। कहा जा रहा था कि मुख्यमंत्री की दिनचर्या से लेकर मुलाकातों तक का एजेंडा नौकरशाही तय कर रही थी। मंत्री और विधायक तक अफसरों के रवैये से नाराज थे। ऊपर से कानून-व्यवस्था के कुछ मामलों ने भी सरकार को बैकफुट पर ला दिया।

इधर विधानसभा के भीतर और बाहर मुख्यमंत्री की कुछ टिप्पणियों और गतिविधियों ने भी सियासी हलकों में सवाल खड़े कर दिए थे। विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव लगातार उन्हें अचेत मुख्यमंत्री बताकर हमला बोल रहे थे।

दूसरी ओर एक बड़ा फैक्टर परिवार और राजनीतिक उत्तराधिकार का भी था। जीवन भर परिवारवाद के खिलाफ राजनीति करने वाले नीतीश कुमार अपने बेटे निशांत कुमार को राजनीति से दूर रखते रहे। लेकिन बदले हालात में यह समझ बन रही थी कि जब तक नीतीश खुद सत्ता के केंद्र में रहेंगे, तब तक निशांत की सियासत में सुरक्षित एंट्री मुश्किल होगी।यही वजह मानी जा रही है कि आखिरकार उन्होंने कुर्सी छोड़ने का फैसला कर लिया। अब सियासी हलकों में चर्चा है कि भाजपा पहली बार बिहार में अपना मुख्यमंत्री बना सकती है, जबकि जदयू कोटे से दो डिप्टी सीएम बनेंगे। यहां तक कि निशांत कुमार को भी सत्ता संरचना में अहम भूमिका मिलने की अटकलें तेज हैं।

इस पूरे घटनाक्रम ने साफ कर दिया है कि बिहार की राजनीति में एक युग का पटाक्षेप हो रहा है और सत्ता की नई पटकथा लिखी जा रही है जहां पटना की कुर्सी बदलेगी, लेकिन सियासत की बाज़ी और भी दिलचस्प होने वाली है।