25 जिलों की कमान संभाल रहे चीफ इंजिनियर सुनील पर चुप्पी बरकरार, सवालों के घेरे में लघु जल संसाधन विभाग,मंत्री से लेकर प्रशासनिक तंत्र तक...
मुख्य अभियंता सुनील कुमार आज भी 25 जिलों के प्रशासनिक प्रभार से जुड़े इस विवाद के केंद्र में हैं। इसे लेकर घु जल संसाधन विभाग खुद में सवालों के घेरे में है. इतना ही नहीं कई अन्य प्रकार के सवाल भी उठ खड़े हुए हैं.
Bihar News : बिहार के लघु जल संसाधन विभाग में भ्रष्टाचार और अनियमितताओं के मामलों में कार्रवाई का पैमाना आखिर अलग-अलग क्यों है? विभाग के एक मुख्य अभियंता के खिलाफ विभागीय जांच में गंभीर अनियमितताएं सामने आने, निलंबन की प्रक्रिया शुरू होने और अनुशासनिक कार्रवाई की तैयारी की चर्चा के बावजूद अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं होना कई गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। हैरानी यह कि कार्रवाई की प्रतीक्षा कर रहे इस अधिकारी का प्रशासनिक दायरा घटने के बजाय बढ़ता चला गया। मुख्य अभियंता सुनील कुमार आज भी 25 जिलों के प्रशासनिक प्रभार से जुड़े इस विवाद के केंद्र में हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस अधिकारी की कार्यप्रणाली पर विभागीय जांच बैठाई गई थी, उसी अधिकारी को इतने बड़े भौगोलिक क्षेत्र की जिम्मेदारी देने का फैसला आखिर किस आधार पर लिया गया? क्या विभाग में जांच और प्रशासनिक निर्णय के बीच कोई तालमेल नहीं है या फिर कार्रवाई की फाइल किसी ऐसे स्तर पर अटकी हुई है, जहां से उसका आगे बढ़ना मुश्किल हो गया है?
जांच में टेंडर और कार्य आवंटन पर उठे थे गंभीर सवाल
उपलब्ध दस्तावेजों और विभागीय सूत्रों के हवाले से सामने आई जानकारी के मुताबिक, मुख्य अभियंता सुनील कुमार की कार्यप्रणाली को लेकर विभागीय सचिव के निर्देश पर अक्टूबर से दिसंबर 2025 के बीच जांच कराई गई थी। जांच में टेंडर प्रक्रिया और कार्य आवंटन से संबंधित गंभीर अनियमितताओं की बात सामने आई थी। तत्कालीन अभियंता प्रमुख स्तर पर उन्हें जिम्मेदार मानते हुए प्रपत्र-क गठित करने और अनुशासनिक कार्रवाई की प्रक्रिया आगे बढ़ाने की बात भी सामने आई थी।
बताया गया कि मामले में निलंबन की फाइल भी उच्च स्तर तक पहुंची थी। लेकिन कार्रवाई का परिणाम सामने आने के बजाय मामला ठंडे बस्ते में चला गया। आज तक यह स्पष्ट नहीं हो सका है कि निलंबन की फाइल पर क्या निर्णय हुआ, उसे किस स्तर पर रोका गया और संबंधित अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की वर्तमान स्थिति क्या है?
12 से बढ़कर 25 जिलों तक पहुंचा अधिकार क्षेत्र
इस प्रकरण को और गंभीर बनाने वाला तथ्य 30 जुलाई 2026 को जारी अधिसूचना संख्या 5023 है। इसके तहत मुख्य अभियंता सुनील कुमार को पटना के साथ भागलपुर का भी अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया। इस फैसले के बाद उनके प्रशासनिक नियंत्रण का दायरा 12 जिलों से बढ़कर 25 जिलों तक पहुंच गया।
सवाल यह है कि जब अधिकारी की कार्यप्रणाली को लेकर विभागीय स्तर पर गंभीर सवाल मौजूद थे, तब उनके अधिकार क्षेत्र का विस्तार करने की जरूरत क्यों पड़ी? क्या विभाग में दूसरे सक्षम अभियंताओं की कमी थी? क्या इस फैसले से पहले विभागीय जांच की स्थिति और अनुशासनिक कार्रवाई से संबंधित तथ्यों की समीक्षा की गई थी? 25 जिलों में लघु सिंचाई योजनाओं, नलकूपों, आहर-पोखर-पइन के जीर्णोद्धार, तकनीकी स्वीकृति और कार्यों की निगरानी जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां जुड़ी हैं। ऐसे में एक अधिकारी के पास इतने बड़े प्रशासनिक दायरे का केंद्रीकरण अपने आप में समीक्षा का विषय है।
दूसरे इंजीनियरों पर कार्रवाई, मुख्य अभियंता के मामले में चुप्पी क्यों?
विभाग में भ्रष्टाचार और कथित अनियमितताओं के दूसरे मामलों में कार्रवाई की खबरें सामने आई हैं। 18 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, लघु जल संसाधन विभाग के तीन इंजीनियरों के खिलाफ कार्रवाई की गई। छपरा में पदस्थापित अधीक्षण अभियंता राजेन्द्र कुमार को आय से अधिक करीब 3.02 करोड़ रुपये की संपत्ति के मामले में निलंबित किया गया। वहीं, भागलपुर के तत्कालीन अधीक्षण अभियंता संजीव कुमार सिंह और बांका के तत्कालीन कार्यपालक अभियंता विजय कुमार वर्मा के खिलाफ निविदा निष्पादन में कथित अनियमितताओं को लेकर विभागीय अनुशासनिक कार्रवाई शुरू की गई।
ऐसे में सवाल और गंभीर हो जाता है कि जब विभाग दूसरे अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की प्रक्रिया आगे बढ़ा रहा है, तब मुख्य अभियंता सुनील कुमार के मामले में अब तक स्थिति स्पष्ट क्यों नहीं की गई? क्या उनके मामले की जांच का निष्कर्ष बदल गया है? यदि आरोपों में दम नहीं है तो विभाग स्थिति सार्वजनिक क्यों नहीं करता? और यदि जांच में अनियमितताएं सामने आई थीं तो कार्रवाई में देरी की वजह क्या है?
SVU की कार्रवाई के बाद बड़े अधिकारियों की जवाबदेही पर भी सवाल
इसी विभाग के सासाराम और बांका में पदस्थापित कार्यपालक अभियंताओं के ठिकानों पर विशेष निगरानी इकाई और आर्थिक अपराध इकाई की कार्रवाई भी हो चुकी है। 30 जुलाई को सासाराम के कार्यपालक अभियंता अरविंद कुमार चौधरी तथा 11 अगस्त को बांका के कार्यपालक अभियंता हरेंद्र कुमार के खिलाफ छापेमारी और जांच की कार्रवाई की खबरें सामने आई थीं।
इन घटनाओं के बाद यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि विभाग में टेंडर से लेकर कार्य आवंटन, तकनीकी स्वीकृति और भुगतान तक की पूरी निर्णय प्रक्रिया की जांच होगी या नहीं? यदि अनियमितताओं में निचले स्तर के अधिकारी कार्रवाई के दायरे में आ रहे हैं, तो बड़े प्रशासनिक और तकनीकी फैसले लेने वाले पदों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।
सरकार और विभाग को देना होगा इन सवालों का जवाब
1. मुख्य अभियंता सुनील कुमार के खिलाफ 2025 में कराई गई विभागीय जांच की अंतिम रिपोर्ट क्या है?
2. क्या उनके खिलाफ प्रपत्र-क गठित किया गया था? यदि हां, तो उसकी वर्तमान स्थिति क्या है?
3. निलंबन और अनुशासनिक कार्रवाई की फाइल उच्च स्तर तक पहुंचने के बाद उस पर क्या निर्णय लिया गया?
4. 30 जुलाई 2026 को अधिसूचना संख्या 5023 के जरिए 25 जिलों का अतिरिक्त प्रभार देने का आधार क्या था?
5. क्या विभाग ने अतिरिक्त प्रभार देने से पहले संबंधित अधिकारी के खिलाफ लंबित जांच की समीक्षा की थी?
6. क्या संबंधित अधिकारी के कार्यकाल में हुए टेंडर और कार्य आवंटन का स्वतंत्र ऑडिट कराया जाएगा?
7. क्या विभागीय जांच में सामने आई अनियमितताओं के लिए जिम्मेदारी तय की गई है?
कार्रवाई नहीं, तो जांच रिपोर्ट सार्वजनिक करे विभाग
यह मामला महज एक अधिकारी को अतिरिक्त प्रभार देने का नहीं है। यह बिहार के लघु जल संसाधन विभाग की पारदर्शिता, प्रशासनिक जवाबदेही और सरकारी योजनाओं में खर्च होने वाले सार्वजनिक धन की निगरानी से जुड़ा है। विभाग का काम किसानों के खेतों तक सिंचाई की सुविधा पहुंचाना है। ऐसे में टेंडर और कार्य आवंटन में किसी भी तरह की अनियमितता का सीधा असर सरकारी योजनाओं और किसानों के हितों पर पड़ सकता है।
अब विभाग के सामने दो ही रास्ते हैं। यदि मुख्य अभियंता के खिलाफ लगे आरोप जांच में प्रमाणित नहीं हुए हैं तो सरकार को जांच का निष्कर्ष सार्वजनिक कर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। यदि जांच में अनियमितताएं सामने आई हैं तो नियमानुसार कार्रवाई में देरी का कारण बताना चाहिए। सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर किसके आदेश और किस आधार पर निलंबन की फाइल आगे नहीं बढ़ी? 25 जिलों का प्रभार संभाल रहे मुख्य अभियंता के मामले में विभाग की चुप्पी कब टूटेगी? भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई का दावा तभी विश्वसनीय होगा, जब जवाबदेही पद और प्रभाव देखकर नहीं, बल्कि तथ्यों और नियमों के आधार पर तय होगी।