Bihar news: देश में सबसे महंगा पेट्रोल डीजल मिलता है बिहार में! सरकार करती है आम जनता से खेल...और निकालती है गरीबों का तेल......पढ़िए इंसाइड स्टोरी...
Bihar news: बिहार, जो देश के सबसे पिछड़े और आर्थिक रूप से कमजोर राज्यों की फेहरिस्त में शुमार किया जाता है, आज एक ऐसे ईंधन संकट की गिरफ्त में है जिसने आम आदमी की जेब पर सीधा वार किया है। ...
Bihar news: बिहार, जो देश के सबसे पिछड़े और आर्थिक रूप से कमजोर राज्यों की फेहरिस्त में शुमार किया जाता है, आज एक ऐसे ईंधन संकट की गिरफ्त में है जिसने आम आदमी की जेब पर सीधा वार किया है। पटना से लेकर भागलपुर, मुजफ्फरपुर से लेकर गया तक पेट्रोल 113 से 115 रुपए प्रति लीटर और डीजल लगभग 100 रुपए के आसपास पहुंच चुका है। हालत यह है कि जो राज्य 6-7 हजार रुपए मासिक आमदनी वाले करोड़ों लोगों का घर है, वहां जनता को देश का सबसे महंगा ईंधन खरीदने पर मजबूर होना पड़ रहा है। सवाल यह है कि आखिर यह महंगाई का तांडव बिहार में ही क्यों?
तेल कंपनियों द्वारा हालिया बढ़ोतरी के बाद पेट्रोल में 2.61 रुपए और डीजल में 2.71 रुपए प्रति लीटर की वृद्धि ने हालात और भी विस्फोटक बना दिए हैं। राजधानी पटना में पेट्रोल 113.35 रुपये प्रति लीटर, मुजफ्फरपुर में 114.13, भागलपुर में 114.31 और कई सीमावर्ती जिलों में 115 रुपये से ऊपर पहुंच चुका है। डीजल भी शतक के करीब खड़ा है, जिससे परिवहन, खेती और रोजमर्रा की जिंदगी पर सीधा असर पड़ रहा है।
अब बड़ा सवाल यह है कि बिहार, जो आर्थिक रूप से कमजोर राज्य माना जाता है, वहां ईंधन इतना महंगा क्यों है? इसके पीछे केवल अंतरराष्ट्रीय बाजार नहीं, बल्कि राज्य की नीतिगत और राजकोषीय मजबूरियां भी जिम्मेदार हैं।
सबसे पहले बात आती है VAT और सरचार्ज की। बिहार में पेट्रोल और डीजल पर लगाया जाने वाला वैट देश के कई राज्यों की तुलना में अधिक है। पेट्रोल पर लगभग 23.58% वैट और उस पर 30 फीसदी अतिरिक्त सरचार्ज लगाया जाता है, जिससे कुल टैक्स का बोझ करीब 21.64 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच जाता है। इसी तरह डीजल पर भी भारी टैक्स स्ट्रक्चर लागू है। यही कारण है कि बिहार में ईंधन की कीमतें स्वतः ही ऊपर चली जाती हैं।
दूसरी बड़ी वजह है राज्य की भौगोलिक और औद्योगिक स्थिति। बिहार में कोई बड़ी तेल रिफाइनरी नहीं है। बरौनी रिफाइनरी या फिर पश्चिम बंगाल और ओडिशा जैसे राज्यों से पाइपलाइन और टैंकरों के जरिए ईंधन की सप्लाई होती है। लंबी दूरी, ट्रांसपोर्टेशन कॉस्ट और डिस्ट्रीब्यूशन चार्ज मिलकर कीमत को और बढ़ा देते हैं। नतीजा यह कि ढुलाई की मार भी जनता को ही झेलनी पड़ती है।
तीसरा कारण है डीलर कमीशन और लॉजिस्टिक अंतर। हर जिले में रिफाइनरी से दूरी अलग होने के कारण पेट्रोल पंपों का खर्च भी अलग-अलग होता है, जिससे बिहार के भीतर ही कीमतों में असमानता देखने को मिलती है।
लेकिन असली सियासी सच्चाई इससे कहीं गहरी है। जीएसटी लागू होने के बाद राज्यों के पास टैक्स वसूली के सीमित रास्ते बचे हैं। शराबबंदी के बाद बिहार सरकार की सबसे बड़ी आय का स्रोत लगभग खत्म हो गया। पहले जहां शराब से हजारों करोड़ का राजस्व आता था, अब वह शून्य के बराबर है। ऐसे में पेट्रोल और डीजल ही राज्य की आर्थिक जीवनरेखा बन चुके हैं।
आंकड़े बताते हैं कि बिहार सरकार पेट्रोल-डीजल से सालाना करीब 8,000 करोड़ रुपये से अधिक की कमाई करती है। यह राज्य के कुल वाणिज्य कर संग्रह का लगभग 18 से 20 प्रतिशत हिस्सा है। साफ है कि अगर इस पर टैक्स घटाया गया, तो राज्य की विकास योजनाएं जैसे सात निश्चय योजना, मुफ्त बिजली, पेंशन और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट सीधे प्रभावित होंगे। यहीं से शुरू होता है असली राजनीतिक द्वंद्व। एक तरफ जनता है जो महंगाई से त्रस्त है, दूसरी तरफ सरकार है जो विकास के लिए संसाधन जुटाने की जद्दोजहद में लगी है। विपक्ष इसे जनता पर टैक्स का अत्याचार बता रहा है, तो सत्ता पक्ष इसे वित्तीय मजबूरी का नाम दे रहा है।
सियासी हलकों में यह सवाल लगातार गूंज रहा है कि क्या बिहार में टैक्स सिस्टम को पुनर्गठित करने की जरूरत है? क्या पेट्रोल-डीजल को जीएसटी के दायरे में लाया जाना चाहिए? लेकिन इसके जवाब में भी एक जटिल आर्थिक गणित सामने आता है, क्योंकि ऐसा करने से राज्यों की आय पर सीधा असर पड़ेगा। शराबबंदी के बाद बिहार की अर्थव्यवस्था एक नए ढांचे पर खड़ी हुई है, जहां पेट्रोल-डीजल अब सिर्फ ईंधन नहीं, बल्कि राजस्व इंजन बन चुके हैं। यही वजह है कि सरकार और जनता के बीच यह टकराव लगातार गहराता जा रहा है। बहरहाल बिहार आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां एक तरफ विकास की गाड़ी दौड़ाने के लिए ईंधन चाहिए, तो दूसरी तरफ वही ईंधन जनता की जेब जलाकर सियासी बहस को और गर्म कर रहा है।