बांकीपुर का रण हुआ त्रिकोणीय, प्रशांत किशोर की सियासी एंट्री से बीजेपी का गढ़ हिला, तेजस्वी यादव की वापसी से आरजेडी ने झोंकी ताकत
Bankipur Assembly Bypoll: पटना की हाईप्रोफाइल बांकीपुर विधानसभा सीट एक विधानसभा सीट की लड़ाई नहीं रह गई है, बल्कि यहां से तीन अलग-अलग राजनीतिक धाराओं की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है।
Bankipur Assembly Bypoll: पटना की हाईप्रोफाइल बांकीपुर विधानसभा सीट का उपचुनाव अब बिहार की सियासत का नया अखाड़ा बन चुका है। यह सिर्फ एक विधानसभा सीट की लड़ाई नहीं रह गई है, बल्कि यहां से तीन अलग-अलग राजनीतिक धाराओं की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। एक तरफ लंबे समय से इस सीट पर दबदबा रखने वाली बीजेपी है, दूसरी ओर सत्ता विरोधी लहर को भुनाने की कोशिश में आरजेडी है, जबकि तीसरी ताकत के रूप में जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर पहली बार चुनावी मैदान में उतरकर अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत कर रहे हैं।प्रशांत किशोर के चुनावी मैदान में उतरने से बांकीपुर का मुकाबला पूरी तरह बदल गया है। जन सुराज के कार्यकर्ताओं ने आक्रामक जनसंपर्क अभियान शुरू कर दिया है। प्रशांत किशोर खुद लगातार लोगों के बीच पहुंचकर अपनी राजनीतिक सोच और बदलाव के एजेंडे को सामने रख रहे हैं। उनके डोर-टू-डोर कैंपेन ने बीजेपी और आरजेडी दोनों की चुनावी रणनीति को प्रभावित किया है।
बीजेपी के लिए बांकीपुर सिर्फ एक सीट नहीं, बल्कि प्रतिष्ठा का सवाल है। यह इलाका लंबे समय से बीजेपी का मजबूत किला माना जाता रहा है। पार्टी ने पहले अभिषेक कुमार उर्फ बंटी को उम्मीदवार बनाया था, लेकिन बाद में पारिवारिक कारणों और विवादों के चलते उनका नाम वापस लिया गया। इसके बाद बीजेपी ने नीरज कुमार सिन्हा को मैदान में उतारा है। पार्टी अब इस सीट को बचाने के लिए पूरी ताकत झोंक रही है।बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन खुद चुनावी प्रबंधन पर नजर बनाए हुए हैं। पार्टी के वरिष्ठ नेता और मंत्री भी मैदान में उतर चुके हैं। प्रशांत किशोर के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए बीजेपी कार्यकर्ताओं ने भी घर-घर संपर्क अभियान तेज कर दिया है। पार्टी का पूरा फोकस अपने परंपरागत वोट बैंक को एकजुट रखने पर है।
तेजस्वी की वापसी, आरजेडी ने संभाला मोर्चा
करीब तीन सप्ताह की विदेश यात्रा से लौटे आरजेडी नेता तेजस्वी यादव अब सीधे बांकीपुर चुनावी जंग में उतरने की तैयारी में हैं। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, पटना पहुंचते ही तेजस्वी यादव आरजेडी प्रत्याशी रेखा गुप्ता के समर्थन में प्रचार अभियान शुरू करेंगे।तेजस्वी यादव के लिए यह चुनाव कई मायनों में अहम है। विधानसभा मॉनसून सत्र के दौरान उनकी अनुपस्थिति को लेकर विपक्ष ने सवाल उठाए थे। अब उनकी वापसी के बाद आरजेडी नेतृत्व चुनावी मैदान में अपनी ताकत दिखाना चाहता है। पार्टी ने अंतिम दौर के प्रचार के लिए तेजस्वी के रोड शो और जनसंपर्क कार्यक्रम की तैयारी की है।बांकीपुर सीट पर प्रचार का शोर 28 जुलाई शाम 5 बजे थम जाएगा और 30 जुलाई को मतदान होगा। ऐसे में तेजस्वी यादव के पास प्रचार के लिए सीमित समय है। आरजेडी इस छोटे समय को पूरी राजनीतिक ताकत के साथ इस्तेमाल करने की रणनीति बना रही है।
बीजेपी का किला बचाने की चुनौती, प्रशांत किशोर की परीक्षा
बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र का इतिहास बीजेपी के पक्ष में रहा है। वर्ष 1995 से बीजेपी इस सीट पर मजबूत स्थिति में रही है। परिसीमन के बाद 2008 में इसका नाम बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र हुआ। इसके बाद नितिन नवीन यहां लगातार पांच बार विधायक रहे। उनके राज्यसभा जाने के बाद सीट खाली हुई और उपचुनाव की स्थिति बनी।इस बार मुकाबला इसलिए भी दिलचस्प है क्योंकि पहली बार प्रशांत किशोर खुद चुनाव लड़ रहे हैं। उनकी राजनीतिक विश्वसनीयता, जन सुराज का प्रभाव और युवाओं के बीच उनकी पकड़ इस चुनाव को नया रंग दे रही है।आरजेडी इस सीट पर बीजेपी विरोधी वोटों को अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रही है, जबकि बीजेपी अपनी पुरानी पकड़ और संगठन शक्ति के भरोसे मैदान में है। वहीं प्रशांत किशोर खुद को पारंपरिक राजनीति के विकल्प के तौर पर पेश कर रहे हैं।
बांकीपुर का फैसला सिर्फ विधायक नहीं, बिहार की सियासी दिशा तय करेगा
बांकीपुर उपचुनाव में कुल 26 उम्मीदवारों मैदान में हैं, लेकिन मुख्य मुकाबला बीजेपी के नीरज कुमार सिन्हा, आरजेडी की रेखा गुप्ता और जन सुराज के प्रशांत किशोर के बीच माना जा रहा है। यह चुनाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके नतीजे बिहार की राजनीति में नए समीकरणों का संकेत दे सकते हैं। अगर बीजेपी अपना किला बचाती है तो उसकी पकड़ मजबूत होगी, आरजेडी जीत दर्ज करती है तो विपक्षी राजनीति को नई ऊर्जा मिलेगी और प्रशांत किशोर की जीत उनकी पार्टी के लिए बड़ा राजनीतिक संदेश बन सकती है। फिलहाल बांकीपुर की जनता के फैसले पर सिर्फ बिहार ही नहीं, बल्कि पूरे देश की राजनीतिक नजरें टिकी हुई हैं। मुकाबला त्रिकोणीय है और हर उम्मीदवार के लिए यह चुनाव सियासी अस्तित्व और भविष्य की बड़ी परीक्षा बन चुका है।