जब दो घंटे के खूनी तांडव ने बदल दी बिहार की सियासत, बरगद की छांव में बिछीं 54 राजपूतों की लाशें, चीखों से थर्रा उठा था मगध और हो गई थी कांग्रेस की विदाई....पढ़िए रक्तरंजित प्रतिशोध की काली कहानी

Bihar Naxal Violence: 29 मई 1987 की रात औरंगाबाद के दो गांवों में हुआ नरसंहार सिर्फ सामूहिक हत्या नहीं था, बल्कि बिहार की राजनीति, प्रशासन और नक्सल हिंसा के इतिहास का निर्णायक मोड़ बन गया।

55 Killed in Bihar Massacre That Changed the State Politics
जब बरगद की छांव में बिछीं 54 राजपूतों की लाशें- फोटो : social Media

Bihar Naxal Violence: तारीख—29 मई 1987... वक्त—रात के तकरीब आठ बजे.... मगध की फिजां में बारूद और खौफ की ऐसी सनसनीखेज दास्तान-ए-खून लिखी जाने वाली थी, जिसने सूबे की सियासत का तख्त को पलट दिया। एमसीसी जिंदाबाद के गगनभेदी नारों के बीच पांच सौ से ज्यादा हथियारबंद हमलावरों का हुजूम औरंगाबाद के दो जुड़वां गांवों- दलेलचक और बघौरा पर कहर बनकर टूट पड़ा। हाथों में चमचमाते गड़ासे, कुल्हाड़ियां और केरोसिन के डिब्बे थामे इस उन्मादी भीड़ के निशाने पर थे राजपूत..... यह महज एक हमला नहीं था, बल्कि सात का बदला सत्तर से लेने का एक खूनी मंसूबा था, जिसने महज दो घंटों में खुशहाल बस्तियों को मत्स्य पालन और बूचड़खाने की मानिंद तब्दील कर दिया।

 बंदूकों की गूंज और पुलिस की बुजदिली

हमले की शुरुआत बघौरा गांव के वन विभाग के हेड क्लर्क गया सिंह के आलीशान सिंहद्वार को तोड़ने से हुई। हमलावरों ने आव देखा न ताव, घर के मर्दों को घसीटकर बाहर निकाला और अंधाधुंध गोलियां बरसा दीं। जो तड़प रहे थे, उन पर गड़ासे से वार किया गया। दरिंदगी यहीं नहीं रुकी, चीखती-चिल्लाती खौफजदा महिलाओं और मासूम बच्चों को घरों से खींचकर बाहर लाया गया। इज्जत और आबरू मटियामेट करने के बाद पांच औरतों की गर्दनों को बेरहमी से कुल्हाड़ी से उतार दिया गया और लाशों को आनन-फानन में गड्ढा खोदकर दफन कर दिया गया।

महज तीन किलोमीटर दूर मदनपुर थाने में बैठी पुलिस गोलियों की तड़तड़ाहट और मजलूमों की चीखें सुन रही थी, मगर वर्दी के भीतर का जिगरा इस कदर कांप चुका था कि दो घंटे तक किसी अफसर की मौके पर जाने की हिम्मत न हुई।

दलेलचक का कोहराम

बगल के गांव दलेलचक में भी खूनी मंजर कुछ जुदा न था। शादी के भोज की तैयारियों के बीच गोलियों की तड़तड़ाहट गूंज उठी। पलंग पर सो रहे दो साल के एक मासूम बच्चे को हमलावरों ने चौखट पर पटक दिया और कुल्हाड़ी से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया। अपनी जान की भीख मांगते एक बेगुनाह ट्रैक्टर ड्राइवर को हमलावरों ने जाति पूछने के बाद भी रहम की एक बूंद न बख्शी, उसे ट्रैक्टर की सीट से बांधकर केरोसिन छिड़का और जिंदा फूंक दिया।

जमीन के मालिकाना हक और कोयल नहर से बढ़ी कीमतों के इस खूनी जंग में नफरत का आलम यह था कि दलेलचक और बघौरा के करीब 40-50 राजपूत मर्दों के हाथ-पैर बांधकर गांव के मुहाने पर खड़े पुराने बरगद के पेड़ के पास लाया गया। रात के सन्नाटे में मुखिया का फरमान गूंजा इनके टुकड़े-टुकड़े कर दो। और फिर शुरू हुआ कत्लेआम।

सुबह का खौफनाक मंजर: चिताओं की राख से बदले का तिलक

जब सुबह के पांच बजे और औरंगाबाद के एसपी सतीश झा समेत आला अफसरान मौके पर पहुंचे, तो नजारा रूह कंपा देने वाला था। बरगद के पेड़ से 29 कटी-फटी लाशें लटक रही थीं, जिनके सिर जमीन पर बिखरे पड़े थे। पूरी जमीन इंसानी खून से लाल हो चुकी थी। कुल 55 इंसानी जिंदगियां मजहबी और जातीय नफरत की भेंट चढ़ चुकी थीं।

अगले दिन 30 मई को जब एक-एक चिता पर 5-7 लाशें रखकर सामूहिक अंतिम संस्कार किया गया, तो वहां मौजूद हर शख्स का कलेजा मुंह को आ गया। बदहवास लोग अपने अपनों की जलती चिताओं की राख से माथे पर तिलक लगा रहे थे-जो साफ तौर पर भविष्य में एक और खूनी प्रतिशोध का खुला ऐलान था।

सियासी जलजला:कांग्रेस का पतन 

इस नरसंहार ने तत्कालीन मुख्यमंत्री बिंदेश्वरी दुबे की हुकूमत की चूलें हिला दीं। मौके पर पहुंचे सीएम एक बिलखते बुजुर्ग को देखकर अपने आंसू न रोक सके, जिसने अपने पूरे कुनबे को खो दिया था। इस नाकामी के बाद सूबे में प्रशासनिक और राजनीतिक उथल-पुथल मच गई।डीजीपी शशिभूषण सहाय और आईजी को तत्काल हटाया गया।13 फरवरी 1988 को मुख्यमंत्री बिंदेश्वरी दुबे को इस्तीफा देना पड़ा।इसके बाद भागवत झा आजाद और सत्येंद्र नारायण सिंह जैसे क्षत्रप आए, पर कोई टिक न सका।

नतीजतन, 1990 के विधानसभा चुनाव में मगध के इस खूनी जख्म ने कांग्रेस को नेस्तनाबूद कर दिया। पार्टी महज 71 सीटों पर सिमट गई और बिहार की सियासत में लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व में जनता दल के एक नए युग का आगाज हुआ। जमीनी रंजिश से भड़की यह चिंगारी पूरे सूबे की कांग्रेसी सत्ता को स्वाहा कर गई। बिहार के सियासी तख्त से कांग्रेस की विदाई हो गई...ऐसी विदाई की अब तक सत्ता नसीब नहीं हुई है....

हीरेश कुमार