जमुई अस्पताल के उपाधीक्षक और 2 चिकित्सा पदाधिकारी निलंबित: पोस्टमार्टम रिपोर्ट में 'खून के निशान' छिपाना पड़ा भारी, NHRC के हंटर से हिला स्वास्थ्य महकमा!
मानवाधिकार आयोग के कड़े रुख के बाद बिहार स्वास्थ्य विभाग ने जमुई सदर अस्पताल के उपाधीक्षक और दो चिकित्सा पदाधिकारियों को निलंबित कर दिया है । इन पर पुलिस हिरासत में हुई मौत की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में तथ्यों को छिपाने का संगीन आरोप है ।
Jamui - बिहार के जमुई जिले में पुलिस हिरासत में हुई एक मौत के मामले में तथ्यों के साथ खिलवाड़ करने वाले तीन सफेदपोशों पर सरकार का डंडा चला है । स्वास्थ्य विभाग ने जमुई सदर अस्पताल के उपाधीक्षक डॉ० सैयद नौशाद अहमद सहित दो अन्य चिकित्सा पदाधिकारियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है । इन पर आरोप है कि इन्होंने 22 फरवरी 2020 को चकाई के नेहालडीह निवासी सिद्ध कोडा उर्फ मुंशी दा की पुलिस हिरासत में हुई मौत के बाद उनकी पोस्टमार्टम रिपोर्ट में वास्तविक तथ्यों को जानबूझकर गायब कर दिया था ।
नाक-मुँह से बहता खून और चोट के निशान किए गायब
न्यायिक दण्डाधिकारी, जमुई की जाँच रिपोर्ट में इस पूरे फर्जीवाड़े का सनसनीखेज खुलासा हुआ है । रिपोर्ट के मुताबिक, मृतक के नाक, कान और मुँह से खून निकल रहा था और शरीर पर कटे के निशान मौजूद थे, लेकिन इन डॉक्टरों ने अपनी रिपोर्ट में इन महत्वपूर्ण चोटों का जिक्र तक नहीं किया । इतना ही नहीं, नियमों को ताक पर रखकर पोस्टमार्टम के दौरान किसी भी बाहरी व्यक्ति को स्वतंत्र गवाह के रूप में दर्ज नहीं किया गया और न ही मृत्यु के सही कारणों को स्पष्ट किया गया ।
NHRC के आदेश पर स्वास्थ्य विभाग की बड़ी स्ट्राइक
इस अमानवीय लापरवाही की गूँज जब राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC), नई दिल्ली तक पहुँची, तो आयोग ने बेहद कड़ा रुख अपनाया । आयोग ने 29 अक्टूबर 2025 को आदेश पारित करते हुए स्पष्ट निर्देश दिया कि रिपोर्ट में हेरफेर करने वाले इस चिकित्सीय दल के पदाधिकारियों के विरुद्ध कड़ी अनुशासनिक कार्रवाई की जाए । आयोग के इसी हंटर के बाद बिहार सरकार के स्वास्थ्य विभाग ने हरकत में आते हुए 10 मार्च 2026 को निलंबन की अधिसूचना जारी की ।
इन तीन 'दागी' डॉक्टरों पर गिरी गाज
निलंबित होने वाले अधिकारियों में जमुई सदर अस्पताल के उपाधीक्षक डॉ. सैयद नौशाद अहमद , चिकित्सा पदाधिकारी डॉ. देवेन्द्र कुमार और चिकित्सा पदाधिकारी डॉ. नागेन्द्र कुमार शामिल हैं । इन तीनों को बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के तहत दोषी मानते हुए निलंबित किया गया है । सरकार ने साफ संदेश दिया है कि न्यायिक प्रक्रिया और चिकित्सकीय ईमानदारी के साथ गंदा खेल खेलने वाले किसी भी अधिकारी को बख्शा नहीं जाएगा ।
मुख्यालय पटना शिफ्ट, अब शुरू होगी विभागीय जाँच
निलंबन की अवधि के दौरान इन तीनों डॉक्टरों का मुख्यालय स्वास्थ्य विभाग, बिहार, पटना निर्धारित किया गया है और इन्हें केवल जीवन निर्वाह भत्ता ही देय होगा । विभाग ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि यह तो सिर्फ शुरुआत है; इन पर लगे गंभीर आरोपों की गहराई से जाँच के लिए अलग से विभागीय कार्यवाही का संकल्प निर्गत किया जाएगा । सक्षम प्राधिकार के अनुमोदन के बाद सरकार के अवर सचिव उपेन्द्र राम ने इस आदेश की पुष्टि की है ।