Bihar Fake Doctor:टेक्नीशियन से डॉक्टर का खेल या बड़ा फर्जीवाड़ा? कथित जाली डिग्री, दो जन्मतिथि और दिल्ली रजिस्ट्रेशन पर उठे सवाल, किसके दबाव में नहीं हो रही कार्रवाई?
डॉ. टिकेन्द्र शर्मा ने कथित तौर पर संदिग्ध या फर्जी शैक्षणिक दस्तावेजों के आधार पर डॉक्टर के रूप में पहचान बनाई और वर्षों तक विभिन्न अस्पतालों में काम किया। ...
Bihar Fake Doctor:बिहार के गया जिले में सामने आया एक कथित फर्जी डॉक्टर का मामला स्वास्थ्य व्यवस्था की साख पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। आरोप है कि डॉ. टिकेन्द्र शर्मा ने कथित तौर पर संदिग्ध या फर्जी शैक्षणिक दस्तावेजों के आधार पर डॉक्टर के रूप में पहचान बनाई और वर्षों तक विभिन्न अस्पतालों में काम किया। यदि जांच में ये आरोप सही साबित होते हैं, तो यह केवल एक व्यक्ति का मामला नहीं बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था की निगरानी और सत्यापन प्रणाली पर भी बड़ा सवाल होगा। हालांकि, इन आरोपों की पुष्टि अभी जांच के बाद ही हो सकेगी और संबंधित पक्ष का विस्तृत जवाब सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया है।
शिकायतकर्ताओं का दावा है कि टिकेन्द्र शर्मा ने दिल्ली मेडिकल काउंसिल में वर्ष 2023 में कथित तौर पर किर्गिस्तान (Kyrgyzstan) से एमबीबीएस और एमडी की डिग्री के आधार पर पंजीकरण कराया और वर्ष 2024 में प्रैक्टिस की अनुमति प्राप्त की। लेकिन आरोप लगाने वाले सवाल उठा रहे हैं कि यदि उन्होंने विदेश से मेडिकल शिक्षा हाल के वर्षों में पूरी की, तो वर्ष 2008 से 2026 तक लगातार देश के अलग-अलग अस्पतालों में काम कैसे करते रहे? इसी बिंदु को पूरे विवाद का सबसे अहम पहलू बताया जा रहा है।

आरोपों के मुताबिक, टिकेन्द्र शर्मा वर्ष 2008 से 2017 तक रायपुर (छत्तीसगढ़) में गैस्ट्रो एवं लिवर विशेषज्ञ डॉ. मनोज लोहाटी के यहां टेक्नीशियन के रूप में कार्यरत थे। इसके बाद वर्ष 2017 से 2019 तक भोपाल (मध्य प्रदेश) में गैस्ट्रो एवं लिवर विशेषज्ञ डॉ. वीरेंद्र चौधरी के यहां भी टेक्नीशियन के तौर पर काम करने का दावा किया जा रहा है। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि उनके पास कथित तौर पर वेतन पर्ची (Salary Slip) जैसे दस्तावेज भी मौजूद हैं, जिनसे यह दावा पुष्ट होता है। 
विवाद का दूसरा बड़ा पहलू दस्तावेजों में कथित विसंगति है। आरोप है कि दिल्ली मेडिकल काउंसिल में जमा दस्तावेजों में जन्मतिथि 26 नवंबर 1986 दर्ज है, जबकि आधार कार्ड और पैन कार्ड में जन्मतिथि 11 नवंबर 1985 अंकित है। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि एक ही व्यक्ति के सरकारी दस्तावेजों में अलग-अलग जन्मतिथि होना पूरे मामले को संदिग्ध बनाता है। हालांकि, इस अंतर का कारण आधिकारिक जांच में ही स्पष्ट हो सकेगा।


इस मामले को लेकर सबसे बड़ा सवाल प्रशासनिक कार्रवाई पर भी उठ रहा है। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि गंभीर आरोपों के बावजूद अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है और मामला केवल जांच के नाम पर लंबित है। उनका कहना है कि यदि कोई व्यक्ति वास्तव में फर्जी डिग्री या गलत दस्तावेजों के आधार पर मरीजों का इलाज करता रहा हो, तो यह केवल कानूनी अपराध नहीं बल्कि लोगों की जान से जुड़ा बेहद संवेदनशील मामला है।
अब निगाहें पुलिस और संबंधित मेडिकल प्राधिकरणों की जांच पर टिकी हैं। यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो यह मामला बिहार ही नहीं, बल्कि पूरे देश में निजी अस्पतालों में डॉक्टरों की नियुक्ति, डिग्रियों के सत्यापन और मेडिकल रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया की पारदर्शिता पर बड़ी बहस छेड़ सकता है। वहीं यदि आरोप गलत साबित होते हैं, तो जांच एजेंसियों के निष्कर्ष ही इस पूरे विवाद की वास्तविक तस्वीर सामने लाएंगे।