Bihar News : डस्टबिन खरीद पर घमासान के बीच उच्चस्तरीय जांच के आदेश, जदयू नेता श्याम जी वर्मा बोले—निष्पक्ष जांच हुई तो होगा दूध का दूध, पानी का पानी

Bihar News : डस्टबिन खरीद का मामला अब सियासी विवाद से निकलकर जांच के दायरे में पहुंच गया है। जदयू नेता श्याम जी वर्मा ने स्वास्थ्य मंत्री निशांत के इस आदेश का स्वागत किया है.......पढ़िए आगे

Bihar News : डस्टबिन खरीद पर घमासान के बीच उच्चस्तरीय जांच क
फैसले का स्वागत - फोटो : SANDIP

BUXAR : बिहार के सरकारी अस्पतालों के लिए कथित तौर पर ऊंची कीमत पर डस्टबिन खरीद का मामला अब सियासी विवाद से निकलकर जांच के दायरे में पहुंच गया है। स्वास्थ्य विभाग से जुड़ी इस खरीद को लेकर उठे सवालों के बीच स्वास्थ्य मंत्री निशांत कुमार ने मामले की उच्चस्तरीय जांच के आदेश दिए हैं। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक जांच की जिम्मेदारी वरिष्ठ अधिकारी त्यागराजन को सौंपी गई है। अब जांच में यह स्पष्ट होने की उम्मीद है कि जिन सामानों को लेकर सवाल उठ रहे हैं, वे वास्तव में सामान्य प्लास्टिक डस्टबिन थे या फिर विशेष तकनीकी क्षमता वाले मेडिकल वेस्ट ट्रीटमेंट उपकरण। मामले की शुरुआत आरटीआई से सामने आई खरीद संबंधी जानकारियों और उसके बाद मीडिया में आई रिपोर्टों से हुई। रिपोर्टों में दावा किया गया कि अस्पतालों के लिए 45 लीटर और 75 लीटर क्षमता वाले डस्टबिन क्रमशः करीब 11 हजार रुपये और 15,490 रुपये तक की दर से खरीदे गए। इन कीमतों की तुलना बाजार में उपलब्ध सामान्य प्लास्टिक डस्टबिन से किए जाने के बाद खरीद प्रक्रिया और सरकारी राशि के इस्तेमाल पर गंभीर सवाल उठने लगे। इसी कीमत के अंतर ने पूरे मामले को राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है। हालांकि, अभी तक यह कहना जांच पूरी होने से पहले उचित नहीं होगा कि सरकारी धन का दुरुपयोग हुआ ही है। दूसरी ओर, केवल विभागीय सफाई के आधार पर सवालों को पूरी तरह खारिज करना भी उचित नहीं होगा। असली तस्वीर अब दस्तावेजों, तकनीकी मानकों और खरीद प्रक्रिया की जांच से ही सामने आएगी।

आखिर ₹11 हजार से ₹15,490 तक कैसे पहुंची कीमत?

पूरे विवाद का सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस सामान को आम तौर पर 'डस्टबिन' कहा जा रहा है, उसकी कीमत इतनी अधिक क्यों थी? उपलब्ध मीडिया रिपोर्टों के अनुसार 75 लीटर क्षमता वाले कंटेनर की खरीद दर ₹15,490 तक बताई गई है, जबकि सामान्य बाजार में इसी क्षमता के प्लास्टिक डस्टबिन इससे काफी कम कीमत में उपलब्ध होने का दावा किया जा रहा है। इसी तरह 45 लीटर क्षमता वाले कंटेनर की कीमत करीब ₹11 हजार बताई गई है। यही अंतर सवाल खड़ा करता है कि क्या दोनों उत्पाद वास्तव में एक जैसे हैं?

BMSICL की सफाई—सामान्य डस्टबिन नहीं, मेडिकल वेस्ट ट्रीटमेंट का विशेष उपकरण

विवाद के बीच बिहार मेडिकल सर्विसेज एंड इन्फ्रास्ट्रक्चर कॉर्पोरेशन लिमिटेड (BMSICL) की ओर से यह पक्ष सामने आया है कि इन कंटेनरों की तुलना सामान्य घरेलू या नगर निकायों में इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक डस्टबिन से करना सही नहीं है। BMSICL के अनुसार ये कंटेनर अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाली माइक्रोवेव आधारित मेडिकल वेस्ट ट्रीटमेंट व्यवस्था का हिस्सा हैं। रिपोर्टों में इन्हें विशेष रूप से तैयार, उच्च तापमान सहने में सक्षम तथा मेडिकल वेस्ट प्रबंधन के लिए इस्तेमाल होने वाले कंटेनर बताया गया है। ऐसी तकनीकी विशिष्टताओं के कारण इनकी कीमत सामान्य प्लास्टिक डस्टबिन से अधिक होने का विभागीय तर्क है। यानी पूरे विवाद का केंद्र सिर्फ 'डस्टबिन की कीमत' नहीं, बल्कि यह सवाल है कि खरीदा गया उत्पाद आखिर था क्या और उसकी कीमत तय करने का आधार क्या था।

अब जांच में किन सवालों के जवाब तलाशने होंगे?

उच्चस्तरीय जांच में यदि पूरी पारदर्शिता के साथ दस्तावेजों की पड़ताल होती है तो कई महत्वपूर्ण सवालों का जवाब सामने आ सकता है- टेंडर में उत्पाद का वास्तविक नाम और तकनीकी स्पेसिफिकेशन क्या था? क्या 45 और 75 लीटर के कंटेनर सामान्य प्लास्टिक डस्टबिन थे या विशेष मेडिकल वेस्ट कंटेनर? इनकी कीमत तय करने का तकनीकी और वित्तीय आधार क्या था? बाजार में उपलब्ध समान तकनीकी उत्पादों की कीमत कितनी थी? टेंडर में कितनी कंपनियों ने हिस्सा लिया? किस कंपनी को काम मिला और किस प्रक्रिया के तहत चयन हुआ? सप्लाई के बाद अस्पतालों में इन उपकरणों का वास्तविक उपयोग हुआ या नहीं? भुगतान किस दर पर और किन शर्तों के आधार पर किया गया? कीमत में टैक्स, परिवहन, इंस्टॉलेशन, वारंटी अथवा अन्य मद शामिल थे या नहीं? क्या निर्धारित तकनीकी मानकों के अनुरूप ही सामान की आपूर्ति हुई? इन सवालों के जवाब ही यह तय करेंगे कि मामला महज तकनीकी उपकरण की महंगी खरीद का है या फिर खरीद प्रक्रिया में वास्तव में कोई वित्तीय अथवा प्रक्रियागत अनियमितता हुई।

श्याम जी वर्मा ने कहा—जनता के पैसे का हिसाब होना चाहिए

मामले पर जदयू नेता श्याम जी वर्मा ने जांच का स्वागत करते हुए कहा कि स्वास्थ्य विभाग से जुड़ी किसी भी खरीद में पारदर्शिता सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। उनका कहना है कि यदि सरकारी राशि खर्च हुई है तो उसके हर रुपये के इस्तेमाल का स्पष्ट हिसाब जनता के सामने होना चाहिए। श्याम जी वर्मा ने कहा कि यदि खरीदे गए कंटेनर वास्तव में विशेष मेडिकल वेस्ट ट्रीटमेंट उपकरण हैं तो विभाग को उनकी तकनीकी गुणवत्ता, स्पेसिफिकेशन, खरीद दर और बाजार में उपलब्ध समान तकनीकी उत्पादों की कीमत का तुलनात्मक विवरण सामने रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि दूसरी तरफ यदि जांच में टेंडर प्रक्रिया, दर निर्धारण, आपूर्ति या भुगतान में किसी प्रकार की अनियमितता सामने आती है तो जिम्मेदारी तय कर कार्रवाई भी होनी चाहिए।

“जांच निष्पक्ष हो तो सच्चाई सामने आएगी”

श्याम जी वर्मा ने कहा कि इस मामले में राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से ज्यादा जरूरी निष्पक्ष जांच है। उन्होंने कहा, “स्वास्थ्य जैसी महत्वपूर्ण व्यवस्था में जनता के पैसे का इस्तेमाल पूरी पारदर्शिता के साथ होना चाहिए। अगर डस्टबिन वास्तव में विशेष मेडिकल वेस्ट ट्रीटमेंट उपकरण हैं तो उनकी तकनीकी गुणवत्ता, बाजार मूल्य, टेंडर प्रक्रिया और खरीद दर का पूरा विवरण सार्वजनिक किया जाना चाहिए। वहीं, अगर खरीद में किसी प्रकार की अनियमितता हुई है तो जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई होनी चाहिए।” उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य मंत्री द्वारा उच्चस्तरीय जांच के आदेश के बाद अब जांच एजेंसी को बिना किसी दबाव के सभी दस्तावेजों की जांच करनी चाहिए। टेंडर से लेकर सप्लाई और भुगतान तक पूरी प्रक्रिया की जांच होने पर ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट होगी।

आरोप बनाम सफाई—अब दस्तावेज तय करेंगे सच्चाई

इस पूरे विवाद में एक तरफ खरीद की दर को लेकर गंभीर सवाल और दूसरी तरफ BMSICL की तकनीकी सफाई है। मीडिया रिपोर्टों में इसे कथित 'डस्टबिन घोटाला' बताया गया है, जबकि BMSICL का पक्ष है कि यह सामान्य कूड़ेदान नहीं बल्कि मेडिकल वेस्ट ट्रीटमेंट सिस्टम में इस्तेमाल होने वाला विशेष कंटेनर है। ऐसे में जांच का महत्व और बढ़ जाता है। क्योंकि सामान्य बाजार के किसी प्लास्टिक डस्टबिन की कीमत की तुलना किसी विशेष तकनीकी उपकरण से करना तभी उचित होगा, जब दोनों की तकनीकी प्रकृति और उपयोग समान हों।

जांच रिपोर्ट पर टिकी निगाहें

अब निगाहें उच्चस्तरीय जांच की रिपोर्ट पर टिक गई हैं। यदि जांच में विभाग का दावा सही पाया जाता है और यह प्रमाणित होता है कि खरीदे गए कंटेनर विशेष तकनीकी मानकों वाले मेडिकल वेस्ट उपकरण थे तथा उनकी कीमत टेंडर प्रक्रिया के अनुरूप थी, तो खरीद पर उठे सवालों को काफी हद तक जवाब मिल जाएगा। वहीं, यदि जांच में बाजार मूल्य, तकनीकी स्पेसिफिकेशन, टेंडर प्रक्रिया, सप्लायर चयन, भुगतान या आपूर्ति में अनियमितता सामने आती है तो जिम्मेदार अधिकारियों और संबंधित एजेंसियों पर कार्रवाई का रास्ता खुल सकता है। फिलहाल इस मामले में किसी निष्कर्ष पर पहुंचने के बजाय जांच पूरी होने का इंतजार करना ही उचित होगा। लेकिन इतना तय है कि ₹11 हजार से ₹15,490 तक की कथित खरीद दर ने स्वास्थ्य विभाग की खरीद व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा कर दिया है। अब उच्चस्तरीय जांच ही तय करेगी कि यह महंगे मेडिकल उपकरण की खरीद थी या सरकारी खरीद प्रक्रिया में कोई गंभीर गड़बड़ी हुई थी।

संदीप की रिपोर्ट