हिंदू के लिए मंदिर जाना-पूजा-पाठ अनिवार्य नहीं, हिंदू धर्म सिर्फ जीवन जीने का तरीका, सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू धर्म को लेकर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी में कहा है कि हिंदू के लिए मंदिर जाना या कोई पूजा-पाठ करना ज़रूरी नहीं है, घर के अंदर दीया जलाना भी आस्था साबित करने के लिए काफी है।

Supreme Court on Hindu
Supreme Court on Hindu- फोटो : news4nation

Supreme Court on Hindu : हिंदू धर्म को “जीवन जीने का तरीका” बताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि किसी व्यक्ति के हिंदू बने रहने के लिए मंदिर जाना या विशेष पूजा-पाठ करना जरूरी नहीं है। शीर्ष अदालत ने कहा कि घर के भीतर दीया जलाना भी किसी की आस्था और धर्म को दर्शाने के लिए पर्याप्त हो सकता है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ जजों की संविधान पीठ सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश, दाऊदी बोहरा समुदाय समेत विभिन्न धर्मों की धार्मिक स्वतंत्रता और धार्मिक प्रथाओं से जुड़े मामलों की सुनवाई कर रही है। पीठ में जस्टिस बीवी नागरत्ना, एमएम सुंदरेश, अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, अरविंद कुमार, ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, प्रसन्ना बी. वराले, आर. महादेवन और जॉयमाल्या बागची भी शामिल हैं।


सुनवाई के दौरान एक हस्तक्षेपकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील डॉ. जी. मोहन गोपाल ने दलील दी कि धार्मिक समुदायों के भीतर से ही सामाजिक न्याय की मांग उठ रही है। उन्होंने कहा कि हिंदू धर्म को एक धार्मिक श्रेणी के रूप में परिभाषित किया गया, जबकि 1966 में यह कहा गया था कि हिंदू वह है जो आध्यात्मिक और दार्शनिक मामलों में वेदों को सर्वोच्च मानता है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या आज हर वह व्यक्ति, जिसे हिंदू माना जाता है, वास्तव में वेदों को सभी आध्यात्मिक और दार्शनिक मामलों में सर्वोच्च मानता है।


इस पर जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा, “इसीलिए हिंदू धर्म को जीवन जीने का तरीका कहा जाता है। हिंदू बने रहने के लिए किसी व्यक्ति के लिए मंदिर जाना या कोई विशेष धार्मिक रस्म निभाना आवश्यक नहीं है।” उन्होंने कहा कि किसी को केवल रस्मों तक सीमित नहीं किया जा सकता और हर व्यक्ति को अपनी आस्था के अनुसार जीवन जीने का अधिकार है। सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने भी टिप्पणी करते हुए कहा, “अगर कोई अपनी झोपड़ी के भीतर दीया भी जला ले, तो वह उसकी आस्था और धर्म को दर्शाने के लिए पर्याप्त है।”


सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले भी कहा था कि यदि हर धार्मिक परंपरा और रीति-रिवाज को संवैधानिक अदालत में चुनौती दी जाने लगे, तो इससे विभिन्न धर्मों की संरचना और परंपराएं प्रभावित हो सकती हैं।


गौरतलब है कि सितंबर 2018 में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ ने 4:1 के बहुमत से ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक को असंवैधानिक और अवैध करार दिया था। अब इसी मामले से जुड़े व्यापक संवैधानिक और धार्मिक सवालों पर नौ जजों की पीठ सुनवाई कर रही है।