वाह रे सिस्टम! मासूम के शव को नसीब नहीं हुआ वाहन, कार्टन में कलेजे के टुकड़े को भरकर पैदल चला लाचार बाप

झारखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था की कड़वी सच्चाई को उजागर करने वाली एक अत्यंत हृदयविदारक घटना है एक पिता अपने नवजात के शव को डिब्बे में बंद कर गोद में उठाए सड़क पर चल रहा था। स्थानीय ग्रामीणों में इस दृश्य को देखकर भारी आक्रोश है

father carries dead newborn in box
वाह रे सिस्टम! मासूम के शव को नसीब नहीं हुआ वाहन, कार्टन में कलेजे के टुकड़े को भरकर पैदल चला लाचार - फोटो : news 4 nation

झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले से इंसानियत को शर्मसार करने वाली तस्वीर सामने आई है। चाईबासा के चक्रधरपुर अनुमंडल अस्पताल में एक पिता को अपने मृत नवजात बच्चे के शव को कार्डबोर्ड के डिब्बे (कार्टन) में रखकर घर ले जाना पड़ा। यह घटना न केवल राज्य की लचर स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोलती है, बल्कि प्रशासनिक संवेदनशीलता पर भी गहरे सवाल खड़े करती है। बंगरासाई गांव के रामकृष्ण हेंब्रम के लिए अपने कलेजे के टुकड़े को इस हाल में ले जाना किसी बड़ी त्रासदी से कम नहीं था।

अस्पताल में पसरा सन्नाटा, नहीं मिली एंबुलेंस की मदद

रामकृष्ण हेंब्रम की पत्नी रीता तिरिया को प्रसव पीड़ा के बाद अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहाँ शनिवार को उन्होंने एक मृत शिशु को जन्म दिया। इस दुखद घड़ी में परिवार को सांत्वना और सहयोग की जरूरत थी, लेकिन परिजनों का आरोप है कि अस्पताल प्रशासन ने शव को गांव तक ले जाने के लिए एंबुलेंस की कोई सुविधा नहीं दी। अपनों को खोने के गम के बीच, साधन के अभाव में पिता ने मजबूरन एक खाली डिब्बे का सहारा लिया और पैदल ही निकल पड़ा।

मानवता शर्मसार: डिब्बे में बंद मासूम और बेबस पिता

सोशल मीडिया और स्थानीय स्तर पर वायरल हुई इन तस्वीरों ने हर किसी को झकझोर कर रख दिया है। एक पिता अपने नवजात के शव को डिब्बे में बंद कर गोद में उठाए सड़क पर चल रहा था। स्थानीय ग्रामीणों में इस दृश्य को देखकर भारी आक्रोश है। लोगों का कहना है कि करोड़ों रुपये के बजट और 'बेहतर स्वास्थ्य सेवा' के दावों के बीच एक गरीब परिवार को सम्मानजनक अंतिम विदाई के लिए एक वाहन तक मयस्सर नहीं हुआ।

अस्पताल प्रबंधन का तर्क: 'नहीं की गई थी मांग'

इस पूरे मामले पर जब बवाल बढ़ा, तो अस्पताल प्रबंधन ने अपना बचाव करते हुए एक अजीबोगरीब तर्क दिया। अधिकारियों का कहना है कि पीड़ित परिवार की ओर से एंबुलेंस की औपचारिक मांग नहीं की गई थी, इसलिए उन्हें जानकारी नहीं मिल सकी। हालांकि, सवाल यह उठता है कि क्या अस्पताल में मौजूद कर्मचारियों और प्रबंधन की यह नैतिक जिम्मेदारी नहीं थी कि वे शोक संतप्त परिवार को खुद मदद की पेशकश करते? फिलहाल, मामले की जांच के आदेश दे दिए गए हैं।

पश्चिमी सिंहभूम में दोबारा दोहराई गई शर्मनाक तस्वीर

गौरतलब है कि चाईबासा और आसपास के इलाकों में यह इस तरह की पहली घटना नहीं है। इससे पहले दिसंबर 2025 में नवामुंडी प्रखंड में भी एक पिता को अपने चार महीने के बच्चे का शव थैली में भरकर ले जाना पड़ा था। बार-बार दोहराई जा रही ये घटनाएं दर्शाती हैं कि सुदूर ग्रामीण इलाकों में एंबुलेंस की उपलब्धता और स्वास्थ्य कर्मियों की संवेदनशीलता अभी भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।