Bihar Tender Scam: बिहार के सबसे बड़े टेंडर घोटाले की खुलने लगी परतें, बड़े अफसरों की ट्रांसफर-पोस्टिंग से लेकर विदेशी प्रॉपर्टी तक का खेल उजागर, IAS संजीव हंस को SVU का सम्मन

Bihar Tender Scam:कमीशनखोरी और काले धन के जाल की परतें खुलनी शुरू हो गई हैं....

 Bihar Tender Scam
कमीशनखोरी और काले धन के जाल की परतें खुलनी शुरू- फोटो : social Media

Bihar Tender Scam: बिहार के चर्चित सरकारी टेंडर घोटाले में अब जांच एजेंसियों का शिकंजा और कसता दिखाई दे रहा है। स्पेशल विजिलेंस यूनिट (SVU) ने वरिष्ठ आईएएस अधिकारी संजीव हंस को पूछताछ के लिए सम्मन जारी किया है। यह सम्मन उनके आवासीय और कार्यालय पते पर भेजा गया है। लेकिन छापेमारी और नोटिस के बावजूद उनका सामने नहीं आना जांच एजेंसियों के संदेह को और गहरा कर रहा है। सूत्रों के मुताबिक एसवीयू फिलहाल उन्हें फरार मानकर आगे की कानूनी रणनीति तैयार कर रही है। दरअसल, 10 जून को ठेकेदार रिशुश्री और संतोष कुमार की गिरफ्तारी के बाद जांच की दिशा तेजी से बदली। उसी दिन मुमुक्षु चौधरी, तारिणी दास और उमेश सिंह को भी गिरफ्तार कर जेल भेजा गया। इसके साथ ही एसवीयू की टीम ने संजीव हंस के ठिकानों पर दबिश दी, लेकिन वे वहां नहीं मिले। इसके बाद जांच एजेंसी ने उन्हें पूछताछ के लिए तलब किया है।

मामले की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि संजीव हंस पहले ही कोर्ट में एफआईआर 5/25 को रद्द करने की अर्जी दाखिल कर चुके हैं। हालांकि एसवीयू ने इसका कड़ा विरोध करते हुए अदालत को बताया है कि यह मामला कई राज्यों में फैले भ्रष्टाचार, वित्तीय लेन-देन और प्रभावशाली नेटवर्क से जुड़ा हुआ है। जांच एजेंसी का कहना है कि यदि संजीव हंस सहयोग नहीं करते हैं तो उन्हें हिरासत में लेकर पूछताछ की जरूरत पड़ सकती है।उधर, टेंडर घोटाले के कथित मास्टरमाइंड माने जा रहे रिशुश्री से लगातार तीसरे दिन भी पूछताछ की गई। शुरुआती दौर में उसने यह कहकर जांच को भटकाने की कोशिश की कि उसके बयान दबाव में दर्ज कराए गए थे। लेकिन जब अधिकारियों ने डिजिटल साक्ष्य, फॉरेंसिक रिपोर्ट और इलेक्ट्रॉनिक दस्तावेज उसके सामने रखे, तो उसके जवाब कमजोर पड़ने लगे।

जांच में सामने आए आरोप बेहद संगीन बताए जा रहे हैं। एजेंसियों के अनुसार सरकारी टेंडरों में कथित तौर पर बड़े पैमाने पर हेराफेरी की गई, नियमों को मनमाफिक बदला गया और करोड़ों रुपये के प्रोजेक्ट्स में कमीशनखोरी का खेल चला। जांच दस्तावेजों के मुताबिक सरकारी बिल पास कराने के लिए 2 से 3.5 प्रतिशत तक कमीशन और बड़े टेंडरों के लिए 5 से 7 प्रतिशत तक वसूली का नेटवर्क संचालित होने के आरोप हैं।

इतना ही नहीं, जांच में यह भी दावा किया गया है कि कई गोपनीय सरकारी दस्तावेज आरोपियों के कब्जे से बरामद हुए हैं। डमी कंपनियों, फर्जी बिलों और पेट्रोल पंपों के जरिए कथित तौर पर रिश्वत की रकम को वैध दिखाने की कोशिश की गई। जांच एजेंसियां इस एंगल की भी पड़ताल कर रही हैं कि क्या प्रभावशाली अधिकारियों की ट्रांसफर-पोस्टिंग, विदेशी यात्राओं और बेनामी संपत्तियों के पीछे इसी नेटवर्क का पैसा इस्तेमाल हुआ। अब सभी निगाहें संजीव हंस पर टिकी हैं। यदि सम्मन के बावजूद वे पूछताछ में शामिल नहीं होते हैं, तो एसवीयू अदालत को इसकी जानकारी देकर आगे की कठोर कानूनी कार्रवाई का रास्ता अपना सकती है। बिहार के इस हाई-प्रोफाइल टेंडर कांड में हर नए खुलासे के साथ सत्ता, सिस्टम और सिंडिकेट के कथित गठजोड़ की नई परतें सामने आती दिख रही हैं।