सुपौल में हाउस कीपिंग योजना के नाम पर करोड़ों का खेल : स्कूलों के बच्चों की सेहत से खिलवाड़, सफाईकर्मियों के शोषण का आरोप

जन सुराज पार्टी ने सुपौल जिले के सरकारी स्कूलों में हाउस कीपिंग के नाम पर करोड़ों के घोटाला होने का आरोप लगाया है। पार्टी ने आज मीडिया को बताया कि सरकारी पदाधिकारियों और एजेंसियों की मिली भगत से यह पूरा खेल हो रहा है....

सुपौल में हाउस कीपिंग योजना के नाम पर करोड़ों का खेल : स्कूल
जन सुराज ने सरकारी स्कूलों में हाउस कीपिंग के नाम पर करोड़ों के घोटाला होने का लगाया आरोप - फोटो : विनय कुमार मिश्रा

Supaul : बिहार के सरकारी स्कूलों में पढ़ रहे छात्र-छात्राओं के स्वास्थ्य और स्वच्छता के साथ खिलवाड़ किए जाने का एक गंभीर मामला प्रकाश में आया है. पहले मध्याह्न भोजन योजना (MDM) और अब पिछले तीन वर्षों से स्कूलों में साफ-सफाई के लिए चलाई जा रही 'हाउस कीपिंग' योजना के नाम पर बड़े पैमाने पर अनियमिता बरती जा रही है. जिले में भ्रष्ट पदाधिकारियों और चयनित एजेंसियों की कथित साठगांठ के कारण धरातल पर स्वच्छता नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं. करोड़ों रुपये के इस खेल के कारण जहां एक ओर बच्चों के स्वास्थ्य पर सीधा खतरा मंडरा रहा है, वहीं दूसरी ओर धरातल पर काम करने वाले गरीब सफाईकर्मियों का खुलेआम आर्थिक शोषण किया जा रहा है. यह आरोप जन सुराज पार्टी की ओर से लगाया गया है.


जन सुराज ने प्रेस वार्ता कर किया महाघोटाले का भंडाफोड़

इस पूरे प्रकरण को लेकर सोमवार को 'जन सुराज' के जिलाध्यक्ष अनिल कुमार सिंह ने एक प्रेस वार्ता आयोजित कर विभागीय भ्रष्टाचार की कई कड़ियों को उजागर किया. उन्होंने कहा कि टेंडर के समय 'रिक्वेस्ट फॉर प्रोपोजल' में कई कड़े मानक तय किए गए थे, लेकिन चुनी गई एजेंसियां धरातल पर एक भी नियम का पालन नहीं कर रही हैं. इसके बावजूद शिक्षा विभाग के अधिकारी हर महीने नियमों की अनदेखी कर एजेंसियों को लाखों रुपये का भुगतान कर रहे हैं. अनिल कुमार सिंह ने चेतावनी दी कि जब तक सफाईकर्मियों को उनके कानूनी अधिकार और न्याय नहीं मिल जाता, तब तक जन सुराज का यह आंदोलन लगातार जारी रहेगा.


श्रम कानूनों का खुला उल्लंघन, मानदेय की राशि भी हजम

विभागीय दिशा-निर्देशों के अनुसार, संविदा पर बहाल होने वाले सफाईकर्मियों को श्रम कानून के तहत मिलने वाले सभी लाभ दिए जाने का अनिवार्य प्रावधान है. इनमें यूएएन (UAN) नंबर आवंटित करना, भविष्य निधि (EPF), कर्मचारी राज्य बीमा (ESI), नियमित बीमा और उचित मानदेय शामिल हैं. लेकिन सुपौल जिले में इन अधिकारों का हनन कर सफाईकर्मियों को मिलने वाला लाभ तो दूर, उनके हक का उचित मानदेय भी एजेंसियां हजम कर जा रही हैं. कई विद्यालयों में सफाईकर्मियों को प्रति माह महज 1000 से 1500 रुपये जैसी मामूली राशि देकर उनका बेरहमी से शोषण किया जा रहा है.


केके पाठक के पत्र का गलत अर्थ निकाल अपात्रों को थमाया काम

शुरुआती दौर में शिक्षा विभाग ने टर्नओवर (न्यूनतम 75 लाख वार्षिक) और 3 वर्ष के कार्य अनुभव की कड़ी जांच के बाद 188 एजेंसियों को सूचीबद्ध किया था. इसी दौरान शिक्षा विभाग के तत्कालीन अपर मुख्य सचिव के. के. पाठक द्वारा 18 सितंबर 2023 को पत्र संख्या 262/C जारी कर डीईओ को आवश्यकतानुसार स्थानीय एजेंसियों को भी लगाने का निर्देश दिया गया था. आरोप है कि सुपौल जिला शिक्षा कार्यालय के अधिकारियों ने इस पत्र का जानबूझकर गलत अर्थ निकाला और मुख्य निविदा की मूल शर्तों व नियमों का उल्लंघन करते हुए अपात्र व चहेती स्थानीय एजेंसियों को काम सौंप दिया, जो आज नियमों को ताक पर रखकर काम कर रही हैं.


अन्य जिलों में रद्द हुए एकरारनामे, सुपौल के अफसरों का वरदहस्त

हैरानी की बात यह है कि नियमों का पालन न करने पर समस्तीपुर के 8 प्रखंडों की एजेंसियों का एकरारनामा रद्द कर दिया गया है और पूर्णिया में भी जांच चल रही है, लेकिन सुपौल में अधिकारी दोषी एजेंसियों को कारण बताओ नोटिस जारी करना भी मुनासिब नहीं समझते. सूत्रों और नाम न छापने की शर्त पर कई प्रधानाध्यापकों (HM) ने बताया कि अगर स्कूल में गंदगी मिलती है तो गाज उन पर गिरती है, लेकिन अगर वे एजेंसी की शिकायत करते हैं, तो खुद अधिकारी ही उन्हें कार्रवाई की धमकी देकर चुप करा देते हैं. प्रधानाध्यापकों का काम अब केवल इतना रह गया है कि वे चुपचाप एजेंसी के कागजातों पर हस्ताक्षर कर उन्हें भुगतान का रास्ता साफ कर दें.


विनय कुमार मिश्र की रिपोर्ट