Political News:तृणमूल कांग्रेस की बगावत से बदला सत्ता का मिजाज, किंगमेकर से साइलेंट पार्टनर बनने के खतरे में नीतीश कुमार की JDU, NDA में बदली ताकत की तख्ती, पढ़िए पूरा गणित
Political News: तृणमूल कांग्रेस के 20 लोकसभा सांसदों के कथित तौर पर बगावत कर NDA को समर्थन देने की खबर ने कुछ राजनीतिक भूचाल पैदा कर दिया है।...
Political News: देश की सियासत में कभी-कभी एक घटनाक्रम ऐसा होता है जो केवल एक राज्य की राजनीति नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्रीय सत्ता समीकरण को झकझोर देता है। तृणमूल कांग्रेस के 20 लोकसभा सांसदों के कथित तौर पर बगावत कर नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया में शामिल होने और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को समर्थन देने की खबर ने कुछ ऐसा ही राजनीतिक भूचाल पैदा कर दिया है। इस घटनाक्रम ने दिल्ली से लेकर पटना और अमरावती तक सत्ता की बिसात पर नए मोहरे सजा दिए हैं।
यदि यह राजनीतिक समीकरण पूरी तरह स्थिर हो जाता है, तो सबसे बड़ा फायदा भाजपा को मिलेगा। 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा 240 सीटों के साथ बहुमत से दूर थी और उसे सरकार चलाने के लिए सहयोगी दलों की जरूरत थी। उस दौर में नीतीश कुमार की जेडीयू और एन. चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी सत्ता के गलियारों में किंगमेकर की भूमिका में थीं। हर बड़े फैसले पर उनकी राय और रजामंदी अहम मानी जाती थी।
लेकिन अब तस्वीर बदलती नजर आ रही है।राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के पास संख्या बल बढ़ने के बाद भाजपा को सहयोगियों की बैसाखियों पर पहले जैसी निर्भरता नहीं रह जाएगी। यही कारण है कि राजनीतिक विश्लेषक इसे "सत्ता संतुलन के बदलाव" के रूप में देख रहे हैं। जो दल कल तक सरकार की मजबूरी थे, वे अब महज सहयोगी बनकर रह सकते हैं।
सबसे बड़ा असर जेडीयू पर पड़ने की चर्चा है। अब तक समान नागरिक संहिता, वन नेशन-वन इलेक्शन और कई अन्य नीतिगत मुद्दों पर जेडीयू अपनी अलग राय रखकर केंद्र पर दबाव बनाने की स्थिति में रहती थी। लेकिन यदि भाजपा के पास वैकल्पिक समर्थन का मजबूत आधार तैयार हो गया, तो जेडीयू की सौदेबाजी की ताकत पहले जैसी नहीं रहेगी।
इसका असर केंद्रीय मंत्रिमंडल की राजनीति पर भी पड़ सकता है। अब तक यह माना जा रहा था कि जेडीयू अपने बढ़े हुए महत्व के आधार पर केंद्र में अधिक प्रतिनिधित्व और प्रभावशाली मंत्रालयों की मांग कर सकती है। मगर नई परिस्थितियों में भाजपा पर वैसा दबाव बनाना आसान नहीं होगा। सत्ता के गलियारों में यह भी चर्चा है कि नए सहयोगी समूहों को साधने के लिए भाजपा अपने राजनीतिक समीकरणों को नए सिरे से गढ़ सकती है।
बिहार की राजनीति पर भी इसके दूरगामी असर पड़ सकते हैं। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व वाली सरकार में भाजपा पहले से अधिक आत्मविश्वास के साथ निर्णय ले सकती है। ट्रांसफर-पोस्टिंग से लेकर नीतिगत फैसलों तक भाजपा की पकड़ और मजबूत होने की संभावना जताई जा रही है। ऐसे में जेडीयू की राजनीतिक भूमिका और प्रभाव को लेकर नए सवाल खड़े हो रहे हैं।
सबसे दिलचस्प असर भविष्य की सीट बंटवारे की राजनीति पर पड़ सकता है। बिहार में लंबे समय से भाजपा और जेडीयू के बीच बराबरी या लगभग बराबरी का फार्मूला चलता रहा है। लेकिन यदि केंद्र में भाजपा पूरी तरह सुरक्षित स्थिति में पहुंच जाती है, तो आने वाले चुनावों में वह बड़े भाई की भूमिका और मजबूती से निभाने की कोशिश कर सकती है। तब जेडीयू के लिए अपने पुराने राजनीतिक वजन को बनाए रखना आसान नहीं होगा।
बहरहाल, भारतीय राजनीति में आंकड़े जितनी तेजी से बनते हैं, उतनी ही तेजी से बदल भी जाते हैं। लेकिन इतना तय है कि तृणमूल कांग्रेस में उठी इस बगावती लहर ने सत्ता की शतरंज पर कई पुराने समीकरणों को चुनौती दे दी है। अब नजर इस बात पर होगी कि यह नया गणित अस्थायी राजनीतिक हलचल साबित होता है या फिर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की राजनीति में ताकत के स्थायी पुनर्वितरण का आधार बनता है।