सवर्णों में बढ़ रही तेजस्वी यादव की पैठ! RJD के MLC में सबसे ज्यादा भूमिहार, ब्राह्मण-राजपूत, BJP-JDU के लिए बढ़ी चुनौती

राजद के विधान परिषद सदस्यों में भूमिहारों की संख्या सबसे अधिक है। पार्टी के कुल एमएलसी में 4 भूमिहार, 3 मुस्लिम, 3 यादव, 2 ब्राह्मण, 2 राजपूत, 1 अनुसूचित जाति, 1 अतिपिछड़ा और 1 वैश्य (ओबीसी) समुदाय से आते हैं।

RJDs Support Base Among Upper Castes
RJDs Support Base Among Upper Castes- फोटो : news4nation

RJD : बिहार की राजनीति में राष्ट्रीय जनता दल (RJD) की पहचान लंबे समय तक यादव-मुस्लिम (MY) समीकरण वाली पार्टी के रूप में रही है। पार्टी का परंपरागत आधार वोट बैंक भी यही माना जाता रहा है। लेकिन अब तेजस्वी यादव के नेतृत्व में राजद अपनी इस राजनीतिक पहचान को बदलने की कोशिश में जुटा है। पार्टी ने सवर्णों को प्रतिनिधित्व देकर अपने सामाजिक समीकरण का विस्तार किया है। इसकी झलक बिहार विधान परिषद में राजद के मौजूदा सदस्यों की जातीय संरचना में भी दिखाई देती है।


राजद के विधान परिषद सदस्यों में भूमिहारों की संख्या सबसे अधिक है। पार्टी के कुल एमएलसी में 4 भूमिहार, 3 मुस्लिम, 3 यादव, 2 ब्राह्मण, 2 राजपूत, 1 अनुसूचित जाति, 1 अतिपिछड़ा और 1 वैश्य (ओबीसी) समुदाय से आते हैं। यानी पार्टी के 17 एमएलसी में 8 सवर्ण समुदायों से हैं। यह आंकड़ा बताता है कि राजद ने अपने पारंपरिक MY समीकरण से आगे बढ़कर दूसरे सामाजिक समूहों को भी राजनीतिक प्रतिनिधित्व दिया है।


भूमिहार से राजद की यारी 

इस बदलाव में सबसे दिलचस्प भूमिहार समुदाय की भागीदारी है। एक समय भूमिहारों को राजद का मुखर विरोधी माना जाता था। लेकिन आज विधान परिषद में इसी समुदाय के चार सदस्य हैं। पिछले चार वर्षों में चार भूमिहार नेताओं को विधान परिषद तक पहुंचाना राजद की बदली राजनीतिक रणनीति का संकेत है। ब्राह्मण और राजपूत समुदाय को भी दो-दो सीटों पर प्रतिनिधित्व मिला है।

हालिया एमएलसी चुनाव ने भी इस रणनीति को मजबूती दी है। पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से राजद के विजयी डॉ. संजीव कुमार भूमिहार समुदाय से आते हैं, जबकि दरभंगा स्नातक सीट से जीतने वाले अनिल झा ब्राह्मण हैं। इन जीतों ने राजद की सवर्ण समुदायों में बढ़ती राजनीतिक स्वीकार्यता की चर्चा तेज कर दी है।

कुर्मी को भी साध रहा राजद 

राजद की रणनीति केवल सवर्ण वोटरों तक सीमित नहीं दिखती। पार्टी ने पटना स्नातक सीट से कुर्मी समुदाय के दिलीप पटेल को उम्मीदवार बनाकर जदयू के परंपरागत सामाजिक आधार में भी सेंध लगाने की कोशिश की। दिलीप पटेल चुनाव नहीं जीत सके, लेकिन दूसरे स्थान पर रहे। उन्हें जदयू के नीरज कुमार से हार का सामना करना पड़ा। यह प्रदर्शन कुर्मी मतदाताओं के बीच राजद की मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।


अब MY से बाहर ला रहे तेजस्वी 

दरअसल, लंबे समय तक विपक्ष में रहने के बाद तेजस्वी यादव के सामने चुनौती केवल MY समीकरण के सहारे सत्ता तक पहुंचने की नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक गठबंधन तैयार करने की है। ऐसे में भूमिहार, ब्राह्मण, राजपूत और कुर्मी समुदायों को प्रतिनिधित्व देना उनकी इसी रणनीति का हिस्सा माना जा सकता है। इसका असर भाजपा और जदयू के परंपरागत सामाजिक आधार पर कितना पड़ेगा, यह आने वाले चुनावों में स्पष्ट होगा। फिलहाल इतना तय है कि बिहार में राजद अपनी पुरानी राजनीतिक छवि से आगे निकलकर नए सामाजिक समीकरण बनाने की कोशिश कर रहा है।