Rented children concept:किराये की संतान, अपनों के होते हुए भी तन्हा बुजुर्ग, क्या अब रिश्ते भी सर्विस बन जाएंगे?
Rented children concept: समाज की बदलती तस्वीर में एक बेहद संवेदनशील और चिंताजनक प्रवृत्ति उभरकर सामने आई है किराये की संतान ।
Rented children concept: समाज की बदलती तस्वीर में एक बेहद संवेदनशील और चिंताजनक प्रवृत्ति उभरकर सामने आई है किराये की संतान । जीवन की सांझ में, जब साथ और सहारे की सबसे अधिक जरूरत होती है, तब कई बुजुर्ग अपने ही घरों में अकेलेपन की कैद झेलने को मजबूर हैं। जिन बच्चों के लिए पूरी उम्र खपाई, वही बच्चे बेहतर भविष्य की तलाश में विदेशों या महानगरों में बस गए और फिर लौटकर पीछे मुड़कर देखने की फुर्सत नहीं मिली।
ऐसे हालात में बड़े शहरों से लेकर कस्बों तक अब ऐसी कंपनियां सक्रिय हो गई हैं, जो किराये के रिश्ते उपलब्ध कराती हैं। ये लोग बुजुर्गों के साथ समय बिताते हैं, सैर कराते हैं, खेलते हैं, बातचीत करते हैं यानी अकेलेपन के खालीपन को कुछ हद तक भरने की कोशिश करते हैं। यह व्यवस्था स्थायी समाधान भले न हो, लेकिन भावनात्मक सहारे का अस्थायी जरिया जरूर बन रही है।
मगर यह सवाल भी उतना ही बड़ा है कि क्या रिश्तों की जगह अब सेवाएं ले रही हैं? खून के रिश्तों की गर्माहट और अपनापन किसी पैकेज में नहीं मिल सकता। यह प्रवृत्ति कहीं न कहीं समाज में बढ़ती आत्मकेंद्रित सोच और पारिवारिक मूल्यों के क्षरण को उजागर करती है।
दूसरी ओर, आर्थिक पहलू भी कम गंभीर नहीं है। निजी क्षेत्र से सेवानिवृत्त बुजुर्गों की आय सीमित होती है, पेंशन नाममात्र की होती है, और महंगी स्वास्थ्य सेवाएं उनकी बची-खुची पूंजी को भी खत्म कर देती हैं। ऐसे में किराये की संतान जैसी सेवाएं हर किसी के लिए संभव नहीं हैं।
विकसित देशों में जहां सरकारें बुजुर्गों की देखभाल की जिम्मेदारी उठाती हैं, वहीं भारत में यह जिम्मेदारी अब भी परिवारों पर ही टिकी हुई है जो धीरे-धीरे कमजोर पड़ रही है।
सरकार को वृद्धाश्रमों और बुजुर्ग कल्याण योजनाओं को मजबूत करना होगा। समाज स्तर पर भी ऐसे प्रयास होने चाहिए, जहां अनाथ बच्चों और बुजुर्गों को साथ लाकर दोनों की भावनात्मक जरूरतों को पूरा किया जा सके।साथ ही, बुजुर्गों को भी मानसिक और शारीरिक रूप से सक्रिय रहने की दिशा में कदम बढ़ाने होंगे योग, ध्यान, सामाजिक मेलजोल और सत्संग उनके जीवन में सकारात्मकता ला सकते हैं।यह सिर्फ एक सामाजिक मुद्दा नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति और मूल्यों की परीक्षा है जहां यह तय होगा कि आने वाले समय में रिश्ते दिल से बनेंगे या सिर्फ किराये पर मिलेंगे।