नीतीश सरकार की 'सुस्ती' पर पटना हाईकोर्ट का प्रहार! ट्रैफिक चालान के नाम पर कब तक चलेगी मनमानी? लोक अदालत को लेकर दागे तीखे सवाल
हाईकोर्ट ने बिहार में ट्रैफिक चालान से जुड़े विवादों के निपटारे के लिए प्रभावी तंत्र की कमी पर कड़ा रुख अपनाया है। चीफ जस्टिस की खंडपीठ ने अन्य राज्यों का उदाहरण देते हुए राज्य सरकार से पूछा है कि इन मामलों को लोक अदालत में क्यों नहीं ले जाया जा रहा ह
Patna : पटना हाईकोर्ट ने बिहार में ट्रैफिक चालान के निपटारे के लिए प्रभावी तंत्र न होने पर नाराजगी जताई है। चीफ जस्टिस की खंडपीठ ने अन्य राज्यों का उदाहरण देते हुए सरकार से पूछा है कि बिहार में इन मामलों को लोक अदालत के माध्यम से क्यों नहीं सुलझाया जा रहा है, जिससे आम जनता को परिवहन विभाग की कथित मनमानी से मुक्ति मिल सके।
लोक अदालत के उपयोग पर हाईकोर्ट का कड़ा रुख
पटना हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस संगम कुमार साहू की खंडपीठ ने रानी तिवारी द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार और बिहार राज्य विधिक सेवा प्राधिकार (BSALSA) से जवाब तलब किया है। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से जानना चाहा कि जब देश के अन्य राज्यों में ट्रैफिक चालान से जुड़े विवादों का निपटारा लोक अदालतों के माध्यम से हो रहा है, तो बिहार इस दिशा में पीछे क्यों है। अदालत ने माना कि चालान विवादों को लोक अदालत में ले जाने से न केवल न्याय प्रक्रिया तेज होगी, बल्कि आम लोगों को भी बड़ी राहत मिलेगी।
अन्य राज्यों की तर्ज पर समाधान की मांग
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता विकास कुमार पंकज ने कोर्ट को बताया कि उड़ीसा, महाराष्ट्र, गुजरात और दिल्ली जैसे राज्यों में ट्रैफिक चालान के विवादों के लिए विशेष लोक अदालतों का सफल आयोजन किया जाता है। उन्होंने चंडीगढ़ का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां लगातार दो सप्ताह तक लोक अदालत चलाकर बड़ी संख्या में लंबित चालान मामलों का समाधान किया गया। कोर्ट ने उड़ीसा का विशेष उल्लेख करते हुए कहा कि ऐसे तंत्र से सामान्य अदालतों पर मुकदमों का बोझ कम होता है और कीमती समय की बचत होती है।
विभाग की 'निष्क्रियता' और आम जनता की परेशानी
सुनवाई के दौरान अधिवक्ता ने कोर्ट का ध्यान विभाग की कथित मनमानी की ओर आकर्षित किया। उन्होंने बताया कि बिहार में प्रभावी तंत्र की कमी के कारण लोगों को जबरन चालान भरने पर मजबूर किया जाता है। जब तक लंबित चालान का भुगतान नहीं होता, तब तक प्रदूषण बोर्ड द्वारा सर्टिफिकेट (PUC) भी जारी नहीं किया जाता है। अधिवक्ता के अनुसार, विभाग की निष्क्रियता के कारण ही बिहार की लोक अदालतों में केस निष्पादन की संख्या अन्य सक्रिय राज्यों की तुलना में कम दिखती है।
14 मार्च की राष्ट्रीय लोक अदालत पर टिकी निगाहें
इस महत्वपूर्ण मामले पर हाईकोर्ट में कल भी सुनवाई जारी रहेगी। विशेष बात यह है कि आगामी 14 मार्च 2026 को 'राष्ट्रीय लोक अदालत' का आयोजन होना है। उम्मीद जताई जा रही है कि कोर्ट इस संदर्भ में राज्य सरकार और संबंधित विभागों को विशेष दिशानिर्देश दे सकता है, ताकि लंबित ट्रैफिक चालान के हजारों मामलों का त्वरित समाधान इस राष्ट्रीय मंच के माध्यम से किया जा सके। इससे लोगों को कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटने से निजात मिलेगी।