शिक्षकों की वेतन विसंगति की मांग खारिज: शिक्षा विभाग ने सुनाया दो टूक फैसला, नियम ताक पर रखकर नहीं मिलेगा वेतनमान
बिहार के प्राथमिक शिक्षा निदेशक ने नियोजित शिक्षकों द्वारा दायर वेतन विसंगति के दावे को सिरे से खारिज कर दिया है. पटना हाईकोर्ट के निर्देश पर हुई इस सुनवाई में विभाग ने स्पष्ट किया कि बिना अनुभव और निर्धारित सेवा अवधि पूरी किए वेतन वृद्धि का लाभ पान
Patna - बिहार के शिक्षा विभाग ने शिक्षकों की वेतन विसंगति से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में अपना फैसला सुनाया है। प्राथमिक शिक्षा निदेशक ने उच्च न्यायालय के आदेश के आलोक में सुनवाई करते हुए शिक्षकों के दावे को खारिज कर दिया है।
पटना हाईकोर्ट के आदेश पर शिक्षा विभाग की बड़ी कार्रवाई
बिहार सरकार के शिक्षा विभाग ने रंजीत कुमार एवं अन्य बनाम बिहार राज्य मामले में माननीय पटना उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए न्यायादेश का अनुपालन करते हुए एक महत्वपूर्ण आदेश जारी किया है। विभाग ने याचिकाकर्ताओं को अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर दिया और कई तारीखों (07.07.2025, 21.07.2025, 31.10.2025 आदि) पर विस्तृत सुनवाई की। प्राथमिक शिक्षा निदेशक विक्रम विरकर ने याचिकाकर्ताओं की दलीलों और विभागीय नियमों की समीक्षा के बाद अपना अंतिम आदेश (संख्या-1062) निर्गत किया है।
शिक्षकों का दावा: वेतन विसंगति और वरीयता का विवाद
याचिकाकर्ताओं का मुख्य तर्क यह था कि उनकी नियुक्ति वर्ष 2014 में स्नातक ग्रेड प्रशिक्षित प्रखंड शिक्षक के रूप में हुई थी। उनका कहना था कि योगदान के समय उनका वेतन विद्यालय में पहले से कार्यरत 'बेसिक ग्रेड' के शिक्षकों (जो पहले शिक्षा मित्र थे) से अधिक था। हालांकि, 11 अगस्त 2015 के विभागीय संकल्प के तहत जब नियत वेतन को वेतनमान में परिवर्तित किया गया, तो याचिकाकर्ताओं का वेतन इन कनीय (बेसिक ग्रेड) शिक्षकों से कम हो गया। इसी विसंगति को दूर करने के लिए उन्होंने विभाग से वेतन पुनरीक्षण में संशोधन की मांग की थी।
विभागीय नियम: वेतन वृद्धि के लिए 3 वर्ष की सेवा अनिवार्य
शिक्षा विभाग ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि 22 सितंबर 2015 के विभागीय आदेश के अनुसार, 1 जुलाई 2015 को वेतनमान का लाभ देने के लिए कुछ निश्चित शर्तें थीं। नियमों के मुताबिक, केवल उन्हीं शिक्षकों को सेवा गणना के आधार पर 3% की वार्षिक वेतन वृद्धि देय थी, जिनकी सेवा 1 जुलाई 2015 तक कम से कम तीन वर्ष पूर्ण हो चुकी थी। जिन शिक्षकों की सेवा अवधि तीन वर्ष से कम थी, वे किसी भी वेतन वृद्धि के पात्र नहीं माने गए थे।
क्यों खारिज हुआ शिक्षकों का दावा?
निदेशक प्राथमिक शिक्षा ने अपने फैसले में दो मुख्य कारण बताए हैं:
शिक्षा मित्रों का अनुभव: विभाग ने पाया कि याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति उन कनीय शिक्षकों (पूर्व शिक्षा मित्र) से करीब 9 वर्ष बाद हुई थी। चूंकि शिक्षा मित्रों ने 1 जुलाई 2015 तक 9 वर्ष की सेवा पूरी कर ली थी, इसलिए नियमों के तहत वे तीन वेतन वृद्धि के हकदार थे।
साक्ष्य का अभाव: याचिकाकर्ता यह साबित करने में विफल रहे कि 1 जुलाई 2015 को वेतन पुनरीक्षण का लाभ पाने के लिए उन्होंने आवश्यक तीन वर्ष की सेवा पूरी कर ली थी।
शिक्षा विभाग का अंतिम फैसला
विभाग ने स्पष्ट किया कि बिना निर्धारित समय अवधि पूर्ण किए किसी भी शिक्षक पर जबरन वेतनमान और वेतन वृद्धि लागू नहीं की जा सकती। इसी परिप्रेक्ष्य में, प्राथमिक शिक्षा निदेशक ने याचिकाकर्ताओं के दावे को अस्वीकृत करते हुए मामले को निस्तारित कर दिया है। यह आदेश आधिकारिक वेबसाइट पर भी अपलोड करने का निर्देश दिया गया है ताकि सभी संबंधित पक्षों को इसकी जानकारी मिल सके।