आबादी बढ़ी लेकिन 84 हजार सरकारी स्कूल हो गए बंद, पढ़िए शिक्षा व्यवस्था का खौफनाक सच

Government Schools: देश के कई हिस्सों में छात्रों के प्रदर्शन के दौरान सरकारी स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की मांग जिस शिद्दत से उठी है, उसने शिक्षा व्यवस्था की कई परतें खोल दी हैं। ...

84000 Govt Schools Closed
शिक्षा व्यवस्था का खौफनाक सच- फोटो : social Media

Government Schools: देश के कई हिस्सों में छात्रों के प्रदर्शन के दौरान सरकारी स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की मांग जिस शिद्दत से उठी है, उसने शिक्षा व्यवस्था की कई परतें खोल दी हैं। प्रदर्शन और विरोध की आवाजों के बीच अनेक राज्यों में स्कूलों के सुधार और सुविधाओं को बेहतर करने की कवायद तेज होती दिख रही है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि निजी स्कूलों के लगातार विस्तार के बावजूद सरकारी स्कूलों का संरक्षण और मजबूत होना आज भी बेहद जरूरी है।

आंकड़ों पर नजर डालें तो 2018-19 से 2025-26 के बीच करीब 84 हजार सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूल कम हुए हैं। इसी अवधि में सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की संख्या में करीब 1.5 करोड़ की गिरावट आई है। स्कूलों की संख्या घटने की एक वजह कम नामांकन वाले विद्यालयों का आपस में विलय भी बताया जाता है। संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल करने के लिए कई जगह कम छात्र संख्या वाले स्कूलों को दूसरे विद्यालयों में मिलाया गया है।

सात साल में एक लाख स्कूल कम

केंद्र सरकार के शिक्षा विभाग के तहत काम करने वाली यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इंफॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन प्लस (UDISE+) के आंकड़े सरकारी शिक्षा व्यवस्था की तस्वीर सामने रखते हैं। इनके अनुसार पिछले सात वर्षों में सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों की संख्या लगभग 11 लाख से घटकर 10 लाख रह गई है।हालांकि स्कूलों की संख्या में कमी को केवल बंद होने की वजह से जोड़ना पूरी तस्वीर नहीं बताता। कम नामांकन वाले स्कूलों का विलय और संसाधनों के पुनर्गठन ने भी इसमें भूमिका निभाई है। बावजूद इसके, यह आंकड़ा इस बात पर गंभीर बहस की जरूरत बताता है कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था को किस दिशा में ले जाया जा रहा है।

शिक्षा बजट में बिहार आगे

राज्यों के शिक्षा बजट पर नजर डालें तो बिहार, उत्तराखंड, राजस्थान और छत्तीसगढ़ ऐसे राज्य हैं, जिन्होंने 2018-19 से औसतन अपने बजट का 15 प्रतिशत से अधिक हिस्सा शिक्षा पर खर्च किया है। इनमें बिहार करीब 18.7 प्रतिशत के साथ आगे है। उत्तराखंड 17.4 प्रतिशत, राजस्थान 16.9 प्रतिशत और छत्तीसगढ़ 16.2 प्रतिशत के साथ इसके बाद हैं।बिहार में शिक्षा बजट हिस्सेदारी में 2018-19 के मुकाबले करीब 5.2 प्रतिशत की वृद्धि बताई गई है। राजस्थान में 3.5 प्रतिशत और छत्तीसगढ़ में 0.3 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। शिक्षा पर खर्च में बढ़ोतरी का असर स्कूलों की संख्या के आंकड़ों में भी कुछ हद तक दिखाई देता है।

कंप्यूटर और इंटरनेट में सरकारी स्कूल पीछे

सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूल कई बुनियादी सुविधाओं के मामले में निजी स्कूलों से पिछड़ रहे हैं। खासकर कंप्यूटर और इंटरनेट जैसी डिजिटल सुविधाओं की उपलब्धता चिंता का विषय है। हालांकि पुस्तकालयों की सुविधा के मामले में सरकारी स्कूल कई जगह निजी संस्थानों से बेहतर स्थिति में हैं।

ग्रामीण इलाकों में सरकारी स्कूलों के कमजोर शैक्षणिक परिणाम भी अभिभावकों के निजी स्कूलों की ओर रुख करने की एक बड़ी वजह माने जाते हैं। सवाल केवल भवन या स्मार्ट क्लास का नहीं, बल्कि बच्चों को मिलने वाली वास्तविक शिक्षा की गुणवत्ता का भी है।

तीसरी कक्षा के बच्चों की पढ़ने की क्षमता पर सवाल

एनजीओ प्रथम की वार्षिक शिक्षा स्थिति रिपोर्ट (ASER) के आंकड़े ग्रामीण सरकारी स्कूलों में सीखने के स्तर को लेकर गंभीर तस्वीर पेश करते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक ग्रामीण सरकारी स्कूलों में तीसरी कक्षा के करीब तीन-चौथाई बच्चे दूसरी कक्षा के स्तर का पाठ तक नहीं पढ़ पाते। गणित में भी तीसरी और पांचवीं कक्षा के बच्चों में घटाव और भाग जैसी बुनियादी गणनाओं को लेकर कमजोरी सामने आती है।

ये आंकड़े केवल ग्रामीण क्षेत्रों से संबंधित हैं, जहां सरकारी स्कूलों पर निर्भरता सबसे ज्यादा है। ग्रामीण इलाकों में करीब 66 प्रतिशत बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं, जबकि शहरी क्षेत्रों में सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों का अनुपात करीब 30 प्रतिशत है।

बुनियादी सुविधाएं नहीं तो सार्थक शिक्षा कैसे?

 योग्य शिक्षकों की उपलब्धता, पर्याप्त स्कूल भवन और जगह, बच्चों के लिए सुलभ एवं शिक्षाप्रद वातावरण और बेहतर पाठ्यक्रम जैसी बुनियादी जरूरतें पूरी किए बिना सार्थक शिक्षा सुनिश्चित करना मुश्किल है।सरकारी स्कूल देश की शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ हैं, खासकर ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों के लिए। ऐसे में स्कूलों की घटती संख्या और नामांकन में गिरावट को केवल आंकड़ों के तौर पर देखना पर्याप्त नहीं होगा। जरूरत इस बात की है कि स्कूलों में शिक्षक, संसाधन, डिजिटल सुविधाएं और सबसे बढ़कर बच्चों की सीखने की क्षमता सुधारने पर जोर दिया जाए। निजी स्कूलों का बढ़ना शिक्षा के विकल्पों को विस्तार देता है, लेकिन इससे सरकारी शिक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी कम नहीं होती। उलटे, सरकारी स्कूल जितने मजबूत होंगे, उतने ही अधिक बच्चों को गुणवत्तापूर्ण और सुलभ शिक्षा का अधिकार वास्तविक रूप से मिल सकेगा।