Bihar News: बिहार में ट्रांसफर सिर्फ दिखावा,असली खेल प्रतिनियुक्ति का, सेटिंग ऑन,नियम ऑफ! रसूख है तो सब संभव!
Bihar News: बिहार में इन दिनों प्रशासनिक गलियारों में एक अजब-गजब खेल की खूब चर्चा है। कागज पर ट्रांसफर नीति का ढोल पीटा जाता है, लेकिन हकीकत में...
Bihar News: बिहार में इन दिनों प्रशासनिक गलियारों में एक अजब-गजब खेल की खूब चर्चा है। कागज पर ट्रांसफर नीति का ढोल पीटा जाता है, लेकिन हकीकत में प्रतिनियुक्ति की ऐसी ‘सेटिंग’ चल रही है कि बाबू कहीं भी पोस्टेड हों, उनकी कुर्सी आखिरकार के मोतीहारी जिला मुख्यालय के मलाईदार दफ्तर में ही टिकती नजर आती है। सरकारी नियमों की किताब कुछ और कहती है, मगर दफ्तरों की हकीकत मानो फुसफुसाकर कहती है जिसका रसूख मजबूत, उसी की नौकरी मजबूत।
नियम के मुताबिक तीन साल के बाद बाबुओं और कर्मचारियों का ट्रांसफर अलग-अलग प्रखंड, अंचल और अनुमंडल में किया जाता है। लेकिन मोतीहारी में यह नियम अक्सर कागजों तक ही सीमित रह जाता है। ट्रांसफर के महज 10 से 15 दिनों के भीतर प्रतिनियुक्ति का जादू ऐसा चलता है कि वही कर्मचारी फिर से जिला मुख्यालय के ‘मलाईदार’ विभाग में तैनात दिखाई देता है। अफसरों की कलम चलती है और आदेश निकलते ही बाबू साहब फिर से आरामदेह कुर्सी पर काबिज हो जाते हैं।
सबसे दिलचस्प और हैरान करने वाली चर्चा उस क्लर्क मुन्ना सिंह को लेकर है, जिनका रिश्वत लेते हुए वीडियो कुछ समय पहले वायरल हुआ था। वीडियो सामने आने के बाद उन्हें पहाड़पुर प्रखंड कार्यालय भेज दिया गया, लेकिन महज दो महीने में ही प्रतिनियुक्ति का नया फरमान आया और बाबू साहब जिला मुख्यालय की विकास शाखा में ‘मलाईदार पोस्ट’ पर विराजमान हो गए। अब सवाल उठ रहा है कि यह करिश्मा है, मेहरबानी है या फिर कोई अदृश्य सियासी-प्रशासनिक सेटिंग?
इसी तरह अभिषेक गिरी का मामला भी चर्चा में है। ढाई साल पहले उनका ट्रांसफर अरेराज अनुमंडल कार्यालय में हुआ था, मगर कुछ ही दिनों में प्रतिनियुक्ति के जरिए वे जिला भूअर्जन कार्यालय में टिक गए। हाल ही में जब उनकी प्रतिनियुक्ति खत्म हुई तो उन्होंने अरेराज में योगदान तो दिया, लेकिन दो दिन बाद ही बिना छुट्टी स्वीकृत कराए गायब हो गए। सूत्र बताते हैं कि अरेराज के एसडीओ सह प्रशिक्षु आईएएस ने इस पर कार्रवाई के लिए रिपोर्ट भी भेजी है।
कहने को तो प्रतिनियुक्ति कार्यहित और अति आवश्यक का हवाला देकर की जाती है, मगर चाय की दुकानों से लेकर दफ्तरों के गलियारों तक चर्चा यही है कि यह पूरा खेल रसूख, पहचान और सेटिंग का है। अगर इस प्रतिनियुक्ति के खेल की बारीकी से जांच हो जाए, तो ट्रांसफर नीति की उड़ती धज्जियों और मलाईदार कुर्सियों की असली कहानी शायद खुलकर सामने आ जाए।
रिपोर्ट- हिमांशु कुमार