सनातन धर्म के संरक्षण के लिए 20,000 किमी की पदयात्रा: विष्णुपद और मंगला गौरी मंदिर पहुंची यात्रा, पाकिस्तान सीमा पर होगा समापन
सनातन धर्म के संरक्षण हेतु बेंगलुरु से निकली 20,000 किमी की पदयात्रा बिहार के गया पहुंची। साधु संतों का यह जत्था पाकिस्तान सीमा तक जाएगा।
Gayaji - सनातन धर्म के संरक्षण, लोक कल्याण और सांस्कृतिक पुनरुत्थान का शंखनाद करते हुए साधु संतों की एक अद्वितीय पदयात्रा इन दिनों बिहार के गया पहुंची है। बेंगलुरु से शुरू हुई यह यात्रा त्याग और तपस्या की एक नई इबारत लिख रही है। करीब 20,000 किलोमीटर लंबे इस संकल्प में अब तक 18,000 किलोमीटर की दूरी तय की जा चुकी है। बिहार इस यात्रा का 11वां राज्य बना है, जहाँ श्रद्धालुओं ने साधु संतों का गर्मजोशी से स्वागत किया।
गया के पावन धामों में पूजा-अर्चना
मोक्ष की भूमि गया पहुंचने पर साधु संत अंजनी उल्लू यादव और माता बी.आर. गीता ने विश्व प्रसिद्ध विष्णुपद मंदिर और शक्तिपीठ मंगला गौरी मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना की। भगवान विष्णु के चरणों में शीश नवाने के बाद संतों ने समाज की एकजुटता और धर्म के प्रति जागरूकता फैलाने का संकल्प दोहराया। माता बी.आर. गीता इस कठिन यात्रा में निरंतर साथ चल रही हैं, जो नारी शक्ति और अटूट श्रद्धा का प्रतीक बनकर उभरी हैं।
श्रीलंका से पाकिस्तान सीमा तक का सफर
इस यात्रा की व्यापकता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसकी जड़ें श्रीलंका से जुड़ी बताई जा रही हैं। भारत के सभी प्रमुख शक्तिपीठों के दर्शन करने के लक्ष्य के साथ यह यात्रा अब अपने अंतिम चरणों की ओर बढ़ रही है। बिहार के बाद यह जत्था उत्तर भारत के प्रमुख केंद्रों जैसे काशी विश्वनाथ, प्रयागराज और मथुरा की ओर प्रस्थान करेगा। यात्रा का समापन राजस्थान, हरियाणा और जम्मू-कश्मीर होते हुए पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय सीमा पर होगा।
कठिन डगर पर जनमानस का संबल
18,000 किलोमीटर का पैदल सफर तय करना शारीरिक और मानसिक रूप से अत्यंत चुनौतीपूर्ण रहा है। मौसम की मार और संसाधनों की कमी के बावजूद संतों का मनोबल अटूट है। यात्रा के दौरान जहाँ-जहाँ भी यह काफिला पहुँचता है, स्थानीय लोग न केवल स्वागत करते हैं बल्कि भोजन और विश्राम की व्यवस्था कर सेवा भाव का परिचय देते हैं। साधु संतों का मानना है कि यह जन-सहयोग ही उनकी असली ऊर्जा है।
सांस्कृतिक जागरूकता का संदेश
यह पदयात्रा मात्र एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आधुनिक समाज को अपनी जड़ों और गौरवशाली सनातन परंपराओं से जोड़ने का एक माध्यम है। आज के समय में जब युवा पीढ़ी अपनी संस्कृति से विमुख हो रही है, तब यह यात्रा एकता, भाईचारे और नैतिक मूल्यों का पाठ पढ़ा रही है। संतों का यह संदेश स्पष्ट है—धर्म का संरक्षण ही समाज का कल्याण है।